तीर्थंकर चौबीस नित उठ ध्यान धरूं जी ध्यान धरूं (Tirthankar Chaubees Nit Uth Dhyan Dharu Ji Dhyan Dharu)

यह भजन चौबीस तीर्थंकर भगवानों की महिमा और वंदना का सुंदर गीत है। इसमें प्रत्येक तीर्थंकर के गुणों का स्मरण करते हुए उनसे आत्मकल्याण, शांति और मोक्षमार्ग की प्रेरणा मांगी गई है। रचना में भगवान महावीर तक सभी तीर्थंकरों को श्रद्धापूर्वक नमन किया गया है। साथ ही, क्रोध, मान और आसक्ति का त्याग कर सच्चे धर्म का पालन करने का संदेश भी दिया गया है। 

 

तीर्थंकर चौबीस नित उठ ध्यान धरूं जी ध्यान धरूं

🎶 लय – चांद चढ्यो गिगनार

✍🏻 रचयिता – साध्वी राजीमतीजी

 

तीर्थंकर चौबीस, 

नित उठ ध्यान धरूं जी, ध्यान धरूं। 

मंगलमय जगदीश, 

महिमा गान करूं जी, गान करूं।।

 

रिषभ अजित भगवान, 

संभव सुखकारी जी, सुखकारी। 

अभिनंदन जग त्राण, 

सुमति जयकारी जी, जयकारी।।

 

पद्म सुपारसनाथ, 

चंदन चंद्रप्रभु जी, चंद्र प्रभु। 

सुविधि, शीतल, श्रेयांस, 

वंदन वासुप्रभु जी, वासु प्रभु।।

 

विमल अनंत विशेष, 

जिनवर धर्मप्रभु जी, धर्म प्रभु। 

शांति-शांति अखिलेश! 

पावन कुंथुप्रभु जी, कुंथु प्रभु।।

 

अर मल्लि तीर्थेश! 

मन का भार हरो जी, भार हरो। 

सुव्रतनाथ जिनेश! 

भव जल पार करो जी, पार करो।।

 

नमि, नेमि गुणधाम, 

कर दो अविकारी जी, अविकारी। 

पार्श्वनाथ का नाम, 

कितना गुणकारी जी, गुणकारी।।

 

त्रिशला-नंदन वीर, 

मेरी पीर हरो जी, पीर हरो। 

दिखलाओ भव तीर, 

चिन्मय रूप करो जी, रूप करो।।

 

क्रोध मान का त्याग, 

सच्चा धर्म यही जी, धर्म यही। 

पर भावों में राग, 

बंधन मार्ग सही जी, मार्ग सही।।

 

यह भजन चौबीस तीर्थंकरों के गुणों का स्मरण कर श्रद्धा और भक्ति को जागृत करता है। उनके आदर्शों पर चलकर मनुष्य आत्मशुद्धि, शांति और सच्चे धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏