जिन-शासन तेज बढ़ाया रे, तीर्थंकर भगवान! (Jin Shasan Tej Badhaya Re, Tirthankar Bhagwan!)

यह भजन तीर्थंकर भगवान और जैन धर्मसंघ की महिमा का सुंदर वर्णन करता है। इसमें अर्हत्, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और मुनि—इन पंच परमेष्ठियों के गुणों का स्मरण किया गया है। रचना बताती है कि तीर्थंकर भगवान ने अनगिनत जीवों को धर्ममार्ग दिखाकर उनका कल्याण किया। साथ ही, भिक्षु, तुलसी और महाप्रज्ञ की परंपरा के माध्यम से जैन शासन के गौरव को भी दर्शाया गया है। 

 

जिन-शासन तेज बढ़ाया रे, तीर्थंकर भगवान!

🎶 लय – कैसी वह कोमल काया रे

✍🏻 रचयिता – साध्वी राजीमतीजी

 

जिन-शासन तेज बढ़ाया रे, 

तीर्थंकर भगवान! 

है कल्पवृक्ष की छाया रे, 

तीर्थंकर भगवान! 

कितनों को पार लगाया रे, 

तीर्थंकर भगवान!

 

अर्हत् है महिमा शाली, 

प्रवचन की छटा निराली। 

द्वादश गुण रूप कहाया रे, 

तीर्थंकर भगवान।।

 

है सिद्ध मुक्त अविकारी, 

शुभ आठ गुणों के धारी। 

है चिन्मय चेतन काया रे, 

तीर्थंकर भगवान।।

 

आचार्य संघ के प्रहरी, 

उनमें हो निष्ठा गहरी। 

छत्तीस गुणों को पाया रे, 

तीर्थंकर भगवान।।

 

है उपाध्याय श्रुतधारी, 

जिनवाणी के अधिकारी। 

पच्चीस गुणों की माया रे, 

तीर्थंकर भगवान।।

 

मुनिपद है सबसे सुंदर, 

है छुपी शक्तियां अंदर। 

गुण सप्तवीस सुहाया रे, 

तीर्थंकर भगवान।।

 

भिक्षु ने बाग लगाया, 

तुलसी ने उसे सजाया। 

अब महाप्रज्ञ का साया रे, 

तीर्थंकर भगवान।।

 

पावस का रंग लगा है, 

सबमें उत्साह जगा है। 

बढ़ने का मार्ग दिखाया रे, 

तीर्थंकर भगवान।।

 

यह भजन तीर्थंकर भगवान और पंच परमेष्ठियों के आदर्शों को अपनाने की प्रेरणा देता है। उनके गुणों का स्मरण जीवन में श्रद्धा, संयम, ज्ञान और आत्मकल्याण की भावना को मजबूत बनाता है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏