तप स्यूं आतमा में भारी बळ आवै (Tap Syu Aatma Mein Bhaari Bal Aave)

यह रचना तपस्या की शक्ति और महत्व को बताती है। इसमें कहा गया है कि तप से आत्मबल बढ़ता है, कर्मों का प्रभाव कम होता है और शरीर तथा मन में मजबूती आती है। मन की इच्छाओं, इंद्रियों और चंचलता पर नियंत्रण पाने के लिए धैर्य और हिम्मत जरूरी है। सच्ची तपस्या परीक्षा के बाद ही फल देती है और मोक्ष का मार्ग दिखाती है। 

 

तप स्यूं आतमा में भारी बळ आवै

🎶लय – स्वामी भीखणजी रो नाम

 

तप स्यूं आतमा में भारी बळ आवै, 

कचरो-करमा रो पल भर जळ ज्यावै, 

कंचन वरणी होवै काया, 

रोग-शोक खनै आंता ही घबरावै।।

 

कोरी बातां करणी सोरी, 

मन री तृष्णा, तजणी दोरी, 

उर में ऊंदरा कूदै जद धीरज ढह ज्यावै।। 

तप स्यूं…

 

इन्द्रयां चंचळ नाच नचावैं, 

बड़ां-बड़ां रो रोब गमावै, 

बिरला हिम्मती मिनख ही संभळ पावै।। 

तप स्यूं…

 

मुश्किल है वश करणो मन नै, 

चाहीजै दिन भर ईं तन नै, 

भाणो देखतां ही लार टपक ज्यावै।। 

तप स्यूं…

 

प्रगट हुवै केई लब्ध्यां मोटी, 

पिण पैली हुवै कड़ी कसौटी, 

खरो उतरै वो सोनो कहलावै।। 

तप स्यूं…

 

मोक्ष महल रो चोथो पथ है, 

भव-वन पार उतारण रथ है, 

‘मधुकर तपस्या रा आगम भी गुण गावै।।  

तप स्यूं…

 

यह रचना सिखाती है कि तपस्या शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन, इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण रखना है। धैर्य, साहस और आत्मबल से तपस्या जीवन को शुद्ध बनाकर मोक्ष की दिशा दिखाती है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏