तन धन रो कांई रे गुमान करै (Tan Dhan Ro Kaai Re Gumaan Kare)

यह भावपूर्ण गीत हमें जीवन की सच्चाई का सरल संदेश देता है। इसमें तन, धन और सांसारिक वैभव के अहंकार को छोड़कर अच्छे कर्म करने की प्रेरणा दी गई है। रचना बताती है कि धन-दौलत, मान-सम्मान और मोह-माया यहीं रह जाते हैं, जबकि कर्म ही हमारे साथ चलते हैं। यह गीत आत्मजागृति, वैराग्य और धर्ममय जीवन की ओर सुंदर प्रेरणा प्रदान करता है। 

 

तन धन रो कांई रे गुमान करै

🎶 लय – दिल करता

✍🏻 रचयिता – साध्वी राजीमतीजी

 

तन धन रो, कांई रे गुमान करै, 

तन-धन रो, 

खाली हाथां जावै, करणी रा फल पावै, 

क्यूं झूठी दौड़ लगावै।।

 

आज रो गरीब काल, धनी बण ज्यावै है, 

क्रोडपति सेठ रा भी, भाग उड़ ज्यावै है। 

होऽऽऽऽ किण स्यूं न डरै, 

बांनै मौत डरावै।।

 

माया किणरै साथ जावै, आगै पीछे देखलै, 

थांरै भी ना साथ जासी, मन में आ सोचलै। 

होऽऽऽऽ सोने री लंका भी तो, 

राख बण ज्यावै।।

 

एकलो ही आयो है तूं, एकलो ही जावैला, 

आसमां रा चांद तारा, सारा छुप जावैला। 

होऽऽऽऽ डेरा उठाऊ थांरा, 

कद उठ ज्यावै।।

 

आज रो भरोसो नहीं, काल री कै सोचै है, 

भस्यो है खजानो भीतर, बाहर कांई खोजै है। 

होऽऽऽऽ नींद उड़ावो थांनै, 

‘तुलसी’ जगावै।।

 

अंततः यह रचना हमें याद दिलाती है कि जीवन क्षणभंगुर है। इसलिए अहंकार और मोह छोड़कर सद्कर्म, आत्मचिंतन तथा धर्म के मार्ग पर चलना ही सच्ची सफलता और कल्याण का आधार है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏