समय ओ बीत ज्यावैलो (Samay O Beet Jyaavelo)

यह भजन साध्वी राजीमतीजी द्वारा रचित एक सुंदर आध्यात्मिक रचना है। इसमें मन की शुद्धता, आत्म-जागृति और समता का सरल संदेश दिया गया है। कवयित्री चेतन आत्मा को संबोधित करते हुए बताती हैं कि जीवन बहुत छोटा है, इसलिए पाप, मोह और बुरी वृत्तियों से बचकर मन को निर्मल रखना चाहिए। यह भजन आत्मचिंतन, संयम और स्थिरता की प्रेरणा देता है। 

 

समय ओ बीत ज्यावैलो

🎶 लय – धर्म की लौ जलायें

✍🏻 रचयिता – साध्वी राजीमतीजी

 

जाग, फिर ओ अवसर थोरै, 

हाथ न आवैलो।।

 

फूल झूलतो टहणी स्यूं, 

झटकै नीचे गिर ज्यावै, 

हर्या-भर्या रूंखां रा पल में, 

पान-पता खिर ज्यावै। 

बिजली रो आखिर झबकारो, 

ओ छुप ज्यावैलो।।

 

थांरी म्हांरी में ओ सारो, 

जीवन बीत्यो ज्यावै, 

बिना स्वार्थ पूछै नहीं कोई, 

सब मतलब स्यूं आवै। 

आतम-ज्ञान बिना कै थांरै, 

साथ ज्यावैलो।।

 

नदी किनारे बंधी झुंपड़ी, 

कद जल में बह ज्यावै, 

चिण्या-चिणाया महल-माळिया, 

सारा ही ढह ज्यावै। 

तप, जप, त्याग बिना प्रभुवर नै, 

किंयां रिझावैलो।।

 

भलो भलाई नै नहीं छोड़ै, 

चाहे संकट आवै, 

झूठो डरै फिरै गलियां में, 

आखिर तक घबरावै। 

खरी कमाई बिना बोल तूं, 

कांई खावैलो।।

 

यह भजन हमें सिखाता है कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि निर्मल और शांत मन में है। मन को पवित्र, स्थिर और समभावयुक्त बनाकर ही जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏