यह भजन आत्मचिंतन, साधना और आत्मशुद्धि की प्रेरणा देता है। रचयिता साध्वी राजीमतीजी ने सरल शब्दों में मनुष्य को अपनी कमियों को पहचानने, मन को निर्मल बनाने और आत्मस्वरूप की अनुभूति प्राप्त करने का संदेश दिया है। इसमें बताया गया है कि दूसरों को सुधारने से पहले स्वयं को सुधारना आवश्यक है। आत्मजागरण के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाने की सुंदर प्रेरणा मिलती है।
म्हांरो मनड़ो ओ साधना में कद ढ़लसी?
🎶 लय – स्वामी भीखणजी रो
✍🏻 रचयिता – साध्वी राजीमतीजी
म्हांरो मनड़ो ओ साधना में कद ढ़लसी?
आतम रूप रो आभास मनै कद मिलसी?
पल-पल सोचूं रोज सबेरे।
मैली आतमां री चादर म्हांरी कद धुलसी ?
ओरां ने तूं कांई सुधारै,
अपनी कुटिया क्यूं न बुहारे।
दीयै तळे ओ अन्धेरो, अब किंयां चलसी।।
निर्मल मन है सुख रो कारण,
विकृत मन रो करणो निवारण।
कद मान माया लोभ री चट्टान हिलसी।।
निन्दा प्रशंसा में सम रहणो,
तातो ठण्डो सब कुछ सहणो।
राख्यां उजळा विचार, सारा पाप झड़सी।।
जन्म मरण रो मेळो लाग्यो,
बण सौदागर रात्यूं भाग्यो।
देणदारी रो हिसाब, आखिर देणो पड़सी।।
मैं ही म्हांरो भाग्य विधाता,
सुख रो दाता दुःख रो दाता।
बन्द चेतना रा द्वार म्हारा कद खुलसी।।
यह भजन हमें याद दिलाता है कि सुख-दुःख, निंदा-प्रशंसा और जीवन-मरण के बीच आत्मजागृति ही सच्चा मार्ग है। जब मन शुद्ध होगा और चेतना जागेगी, तब आत्मकल्याण का द्वार खुल जाएगा।
🙏जय जिनेंद्र🙏
