यह पद आचार्य भिक्षु स्वामी के प्रति गहरी श्रद्धा और भक्ति का सुंदर वर्णन करता है। इसमें भक्त बताता है कि स्वामीजी उसके जीवन के हर क्षण, हर सांस और हर कार्य में बस गए हैं। जैसे मिश्री में मिठास घुली होती है, वैसे ही भिक्षु स्वामी उसके मन, वाणी और विचारों में रच-बस गए हैं। यह रचना गुरु भक्ति, स्मरण और आत्मिक शांति की सरल और गहरी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करती है।
सांवरियो म्हारै रूं रूं में रमग्यो - मिश्री में मीठास बण्यो
🎶 लय – बादलियो आंखड्ल्यां मैं बरस्यो
सांवरियो म्हारै,
रूं रूं में रमग्यो, रूं रूं में रमग्यो,
मिश्री में मीठास बण्यो सांवरियो।
भिखू स्याम, भिखू स्याम,
जीभड़ल्यां में जमग्यो, जीभड़ल्यां में जमग्यो,
फुलड़ा जियां सुवास बण्यो सांवरियो।।
धूप छांह लियां जियां, चांदड़लै में च्यानणी,
पून में ज्यू प्राण प्रीत, रीत गीत रागणी,
कविता में अनुप्राश बण्यो, सांवरियो।।
खातां पीतां सोतां उठतां, याद आवे सांवरियो,
नाल में उतरता-चढता, याद आवे सांवरियो,
साथी श्वासोश्वास, बण्यो, सांवरियो।।
फिरतां घिरतां काम करतां, याद आवै सांवरियो,
मोड़ै स्यूं बारै नीसरतां, याद आवै सांवरियो,
पंखेरू आकाश बण्यो, सांवरियो।।
विकट विरोधी विष पी शंकर, बणग्यो म्हांरो सांवरियो,
डरयो न धमक्यां स्यूं अभयंकर, बणग्यो म्हांरो सांवरियो,
सज्जन जन विश्वास बण्यो, सांवरियों।।
लौकिक लोकोत्तर व्याख्या में, लोहो पड़सी मानणो,
बाहर भीतर एक सरीखो, च्यांनणो ही च्यांनणो,
देहली दीप प्रकाश बण्यो, सांवरियो।।
त्याग भोग नै घी-तम्बाखू, मेल बताकर सुलझायो,
साधु-असाधु विभेद वेद रो, हेतु सुणाकर समझायो,
सूरज-तेज निवास बण्यो, सांवरियो।।
“सागर” भाद्रव सुद तेरस नै, ज्ञान सरायो सिरियारी,
ध्यान योग में प्राण विसर्जन, इचरज पायो सिरियारी,
ले समाधि थिर-वास बण्यो, सांवरियो।।
अंत में यह पद दर्शाता है कि जब गुरु हर पल स्मरण में रहते हैं, तब जीवन धन्य हो जाता है। भिक्षु स्वामी का स्मरण ही सच्चा सहारा बनकर शांति और आत्मिक आनंद देता है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
