स्वामीजी म्हानै दरसण दीन्हाजी (Swamiji Mhane Darsan Deenha Ji)

यह पद एक भक्त के हृदय में जागे गहरे प्रेम और श्रद्धा का सुंदर वर्णन है। इसमें स्वामीजी के दर्शन मिलने की खुशी और उनके दिव्य रूप का भावपूर्ण चित्रण किया गया है। भक्त अपने अनुभव को सरल शब्दों में व्यक्त करता है और बताता है कि स्वामीजी का रूप, चाल और व्यवहार कितना आकर्षक और शांति देने वाला है।

 

स्वामीजी म्हानै दरसण दीन्हाजी

🎶 लय – सुपनो जगाई आधी रात में 

 

स्वामीजी म्हानै दरसण दीन्हाजी।

दरसण दीन्हां प्रेम स्यूं म्हारै माथै पर धर हाथ।

स्वामीजी म्हानै दरसण दीन्हाजी!

म्हारै मनड़े री पूछी दो बात। 

 

सांवली सूरत सोवणी, 

तपुंतपुं करतो ललाट। 

काजलिया प्यालां जीसी, 

आंख्यां करै पलाट।

 

काना केश सुहावणा, 

लम्बी लम्बी लहराती लोल। 

एकल मूंहां भंवर सी, 

चंदै सो चहरो गोल।

 

लम्बो कद लम्बी ग्रीवा, 

लम्बा लम्बा गोडां तांणी हाथ। 

तीखी तीखी लम्बी लम्बी आंगल्यां, 

हथेल्यां हिंगलू री जात।

 

भरवां अंग-अंग भलकतो, 

चूड़ी उतार शरीर। 

सीनो बबर्ची शेर सो, 

मुद्रा मृदु गंभीर।

 

मुखड़ै ओपै मुंहपती, 

खांधै पर ओगो सुरंग। 

झोली डावा हाथ में, 

मलपती चाल मतंग।

 

उभर्या पगां री चलकती, 

नख-द्युति अजब अमीर। 

क्यूं रै? कह्यो स्वामी मुलकतां, 

खुलग्या म्हारां तकदीर।

 

आठे तेरस भाद्रवी, 

मेह अंधारी रात। 

‘चम्पक बिरधी भवन में, 

सुपनै में सुपनै सी बात।

 

अंत में भक्त यह अनुभव करता है कि स्वामीजी के दर्शन से उसका जीवन धन्य हो गया। यह पद सच्ची भक्ति और गुरु के प्रति प्रेम की गहराई को सरल और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करता है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏