यह भक्ति-गीत आचार्य महाप्रज्ञजी के जन्मोत्सव पर श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता का सुंदर भाव प्रस्तुत करता है। इसमें उनके जीवन, ज्ञान, साधना, प्रज्ञा और समाज के प्रति महान योगदान का वर्णन किया गया है। गीत बताता है कि आचार्यश्री ने अपने विचारों, शिक्षा और आध्यात्मिक दृष्टि से अनगिनत लोगों के जीवन को प्रकाशित किया। उनके जन्मदिवस को मंगलमय उत्सव के रूप में मनाया गया है।
महाप्रज्ञ अभिवंदना - उजली भोर आ सुखकार जन्म दिवस रो ओ त्यौंहार
🎶 लय – शासन कल्पतरू
✍🏻 रचयिता – साध्वी निर्वाणश्रीजी
उजली भोर आ सुखकार,
जन्म दिवस रो ओ त्यौंहार,
गण रे कण-कण में खुशहाली छाई,
आंगण नई बहार।
आई पुण्य घड़ी, बरसे इमरत री झड़ी,
लागी लागी रंगरळी ।।
मणिधारी बालू रा जात,
भगिनी मालूजी रा भ्रात,
कालू कर स्यूं पा दीक्षा,
मुनि तुलसी स्यूं ली शिक्षा।
थांरी प्रज्ञा किरणां स्यूं चमके है,
भैक्षव गण गिगनार।।
नवयुग रा हो नया प्रभात,
मेधा है थांरी अवदात,
दिव्य दृष्टि रा हो दाता,
अनुपम युग रा संधाता।
अपणे पौरुष स्यूं खोल्या है,
थेतो नव निधियां रा द्वार।।
सरस्वती रा पुत्र ललाम,
रचनावां थारी अभिराम,
तुलसी युग रा योगीश्वर,
गूंजे चँहु दिशि प्रेक्षा-स्वर।
थांरे अवदानां रो अनुगुंजन है,
सात समन्दर पार।।
वीर-गोयम रो ओ शासन,
मन भावन है अनुशासन,
जुग जुग जोड़ी अमर रहे,
सुख सरिता री धार बहे।
मंगल बेला में अर्पित है,
निर्मल भावां रो उपहार।।
यह गीत आचार्य महाप्रज्ञजी के प्रति श्रद्धा और आदर का भावपूर्ण अर्पण है। उनका ज्ञान, अनुशासन और मानवता का संदेश सदैव प्रेरणा देता रहेगा तथा आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहेगा।
🙏जय जिनेंद्र🙏
