यह प्रेरणादायक गीत हमें सिखाता है कि दुःख और कठिनाइयों के समय धैर्य, साहस और समता बनाए रखनी चाहिए। रचना में बताया गया है कि दुःख जीवन की एक स्वाभाविक परीक्षा है, जो हमें मजबूत और जागरूक बनाती है। निराश होने के बजाय आत्मबल बढ़ाकर आगे बढ़ना चाहिए। सुख-दुःख को समान भाव से स्वीकार कर मन को स्थिर और सकारात्मक रखने का संदेश इसमें दिया गया है।
दुःख में तूं धीरज धर रे
🎶 लय – जहाँ डाल-डाल पर
✍🏻 रचयिता – राकेश मुनि
दुःख में तूं धीरज धर रे,
तूं अनन्त शक्ति का स्वामी,
आर्त्तध्यान न कर रे।
दुःख का क्षण है सहज तपस्या,
समता से तूं सह रे,
नहीं दीनता की भाषा तूं,
अपने मुख से कह रे।
जीवन का सागर अपने ही,
साहस से तूं तर रे।।
सुख में मुर्च्छा बढ़ जाती है,
अनुभव यह बतलाता,
नई प्रेरणा देता दुःख,
सोया मानस जग जाता।
दुःख को तूं वरदान मान,
आंखों आंसू मत झर रे।।
तेरे से भी अधिक सहन,
करते रहते नर-नारी,
शान्त-भाव से उन्हें याद कर,
बना न दिल को भारी।
सुख-दुःख खेल कल्पना का है,
व्यथा दूर तूं कर रे।।
कष्टों के बन्दर डरने वालों को,
अधिक डराते,
देख वीरवृत्ति मानव की,
शांत सभी बन जाते।
निर्भय बनकर बढ़ता जा तूं,
कष्टों से मत डर रे।।
दिवस बाद में रात,
रात के बाद दिवस होता है,
देख अंधेरा सम्मुख गहरा,
क्यों विचलित होता है।
‘मुनि राकेश’ निराशा का,
चिन्तन मन से तूं हर रे।।
यह गीत हमें हर परिस्थिति में धैर्य और निर्भयता बनाए रखने की प्रेरणा देता है। दुःख को अवसर मानकर साहसपूर्वक आगे बढ़ने वाला व्यक्ति ही जीवन में शान्ति, शक्ति और सफलता प्राप्त कर सकता है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
