सूरज का उगना याद रहा पर दिन का ढलना भूल गये (Suraj Ka Ugna Yaad Raha Par Din Ka Dhalna Bhool Gaye)

यह भावपूर्ण रचना हमें जीवन की सच्चाइयों को पहचानने की प्रेरणा देती है। मनुष्य अक्सर सपनों, सुखों और बाहरी खोजों में इतना खो जाता है कि जीवन के मूल उद्देश्य को भूल जाता है। कवयित्री ने सरल शब्दों में समय, समता, आत्मचिंतन, सदाचार और मृत्यु की अनिवार्यता का स्मरण कराया है। यह गीत हमें जागरूक होकर सार्थक और संतुलित जीवन जीने का संदेश देता है। 

 

सूरज का उगना याद रहा पर दिन का ढलना भूल गये

🎶 लय – दिल लूटने वाले

✍🏻 रचयिता – साध्वी कनकश्रीजी

 

सूरज का उगना याद रहा, 

पर दिन का ढलना भूल गये। 

पलकों में सपने मंजिल के, 

पांवों से चलना भूल गये।।

 

गंभीर समस्याओं का सागर, 

इधर उधर लहराता है। 

लहरों के साथ बहे जाते, 

बांहों से तरना भूल गये।।

 

सुख बांट-बांट भोगा जाता, 

दुख भोगे सभी अकेले ही। 

जीते हैं औरों के खातिर, 

अस्तित्व स्वयं का भूल गये।।

 

अविराम बही जाती जीवन की, 

धारा समय धरातल पर। 

क्यों भोर भरी दास्तान शांति, 

समता की लिखना भूल गये।।

 

सब खड़े मौत की लाईन में, 

कब किसका नंबर आ जाए। 

तुम रचा अमरता की मेहंदी, 

मृत्युंजय बनना भूल गये।।

 

मंदिर-मंदिर में ढूंढ रहे, 

कब से ज्योतिर्मय ईश्वर को। 

जीवन मंदिर में सदाचार का, 

दीप जलाना भूल गये।।

 

जब कल्पवृक्ष बीज और अमृत के, 

कलश पास में है। 

तब ‘कनक’ स्वयं की राहों में, 

क्यों फूल खिलाना भूल गये।।

 

यह रचना आत्मजागरण का सुंदर संदेश देती है। जीवन की क्षणभंगुरता को समझकर सदाचार, समता और आत्मकल्याण की राह पर चलना ही सच्ची सफलता है। यही इसका सार और प्रेरणा है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏