प्रातः उठकर शुद्ध भाव से परमेष्ठी का ध्यान धरूं (Pratah Uthkar Shuddh Bhav Se Parmeshti Ka Dhyan Dharu)

यह भक्ति गीत सुबह उठकर शुद्ध मन से परमेष्ठी का ध्यान करने की प्रेरणा देता है। इसमें देव, गुरु और जिन धर्म की शरण लेकर जीवन रूपी भवसागर से पार होने का मार्ग बताया गया है। प्रत्येक पंक्ति में नवकार मंत्र और पंच परमेष्ठी की महिमा को सरल शब्दों में समझाया गया है। यह भजन बताता है कि सच्चे भाव से जप करने पर मन शुद्ध होता है, ज्ञान बढ़ता है और जीवन में सुख-शांति प्राप्त होती है।

 

प्रातः उठकर शुद्ध भाव से परमेष्ठी का ध्यान धरूं

🎶 लय – प्रभाती  

✍🏻 रचयिता – साध्वी राजीमती जी

 

प्रातः उठकर शुद्ध भाव से, 

परमेष्ठी का ध्यान धरूं। 

देव, गुरू जिन-धर्म शरण से, 

भव सागर को पार करूं।। 

 

वन्दूं मैं प्रतिदिन अर्हं को, 

श्री सिद्धं आचार्यवरम्।  

उपाध्याय सद्ज्ञान प्रदाता, 

मुनिवर महा उपकार करम् ।।

 

ॐ अरिहंत देव सिद्धम अघ-हरणम्,

सिद्धनिरंजन सुख-करणम्। 

श्री आचार्य भवोदधि-तरणम्, 

उपाध्याय मुनिवर शरणम्।।

 

मस्तक पर अरिहंत विराजित, 

भृकुटि भाग में सिद्ध रहे। 

हृदय कमल में गुरू नाभि में, 

उपाध्याय मुनि चरण बहे।। 

 

संकट कष्ट कटे भव संचित, 

महामंत्र के दृढ़ बल से। 

भूत-प्रेत बाधाएं टलती,

अभिमंत्रित नव पद जल से।।

 

ॐ हीं श्रीं क्लीं विघ्न-विनाशक, 

महामंत्र जग का त्राता। 

सच्चे दिल से जपने वाला, 

सुख शान्ति वैभव पाता।।

 

इस भजन से हमें प्रेरणा मिलती है कि हम रोज़ श्रद्धा और विश्वास से परमेष्ठी का ध्यान करें। सच्चे मन से जप करने से कष्ट दूर होते हैं और जीवन में शांति, सुख और आध्यात्मिक उन्नति मिलती है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏