यह रचना तपस्या की महिमा और उसके आध्यात्मिक महत्व को सरल ढंग से बताती है। इसमें तप को जीवन का सिंगार, आत्मिक शांति का मार्ग और मुक्ति की ओर ले जाने वाला साधन बताया गया है। तप से तन और मन के रोग दूर होते हैं, आत्मा निर्मल बनती है और कर्मों के बंधन टूटते हैं। रचना कठिन तप में धैर्य, साहस और हिम्मत रखने की प्रेरणा देती है।
तपस्या री महिमा भारी तपस्या है मंगलकारी
🎶लय – प्रज्ञा के दीप जलेंगे
तपस्या री महिमा भारी, तपस्या है मंगलकारी,
तपस्या जीवन रो सिणगार है।
हो भाया! तपस्या स्यूं होवे नैया पार है।।
तप है गंगा तप है जमना,
तप है तीरथ धाम जी,
तप रा जठे नगारा बाजे,
सरे अचिंत्या काम जी,
आत्मिक शांति रो पथ है,
शिवपुर जावण रो रथ है।
चढ़ज्यावै बो हो जावे पार है।।
तन मन रा सब रोग मिटावे,
उजळे आत्मा राम जी,
तप रे मारग जो भी चाले,
देव करे गुणग्राम जी,
टूटे तप स्यूं अघबंधन,
आत्मा बण जावे कुंदन।
खुल जावे शिवनगरी रा द्वार है।।
उदर भर्योड़ो होवे जद तो,
तप में पूरो मन लागे,
के उपवास के आठ के पूरा,
मासखमण पचखूं सागे,
पर जब आ भूख सतावे,
सारो ही रोब गमावे।
छा जावे आंख्यां में अंधार है।।
पर जो शूरवीर होवे वो,
इण रे सामी मंड जावे,
शूरवीर रे घर ‘प्रमोद’ आ,
भजन मंडली गुण गावे,
हिम्मत की कीमत भारी,
हिम्मत री महिमा न्यारी।
तप स्यूं ओ चमन हुयो गुलजार है।।
यह रचना संदेश देती है कि तपस्या कठिन होने पर भी जीवन को शुद्ध और सुंदर बनाती है। साहस और दृढ़ संकल्प से तप करने पर आत्मिक शांति मिलती है और मुक्ति का मार्ग खुलता है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
