यह भजन भगवान महावीर के शासन, तप, त्याग और संयम की महिमा का सुंदर वर्णन करता है। रचयिता ने तपस्या को आत्मा की शुद्धि करने वाली गंगा बताया है, जिसमें संयम रूपी साबुन से जीवन के दोष दूर होते हैं। भजन हमें सिखाता है कि तप से तन-मन के विकार मिटते हैं, संकट दूर होते हैं और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
तपस्या री गंगा - महावीर रै शासण री महिमा महकावां
🎶 लय – स्वामी भीखणजी रो नाम
✍🏻 रचयिता – साध्वी राजीमतीजी
महावीर रै शासण री,
महिमा महकावां।
स्वामी भीखणजी रै संघ री,
गुण गाथा गांवां।।
आओ तपस्या री गंगा में,
संयम साबुन स्यूं आ,
आतमां री चादर धोवां।।
तप की गरमी तेज बढ़ावै,
तन-मन का सब रोग मिटावै।
शासन माता रा सब आओ,
मिलजुल गीत गावां।।
बिना तपस्या त्याग अधूरो,
तप स्यूं टळज्या संकट दूरो।
देव, दानव, राक्षस तप स्यूं,
सारा साध पावां।।
मंत्र सिद्धि में तपस्या जरूरी,
तंत्र साधना हो ज्यावै पूरी।
तप है साचो मंगल,
आवो मंगल बण ज्यावां।।
तप है अमृत रस रो प्यालो,
शिवनगरी रो खोलै ताळो।
फळज्या आशा वांछा,
मन री सारी कामनावां।।
मन नै वश में करणो तपस्या,
नमणो, खमणो, दमणो तपस्या।
जीणो अल्पाहारी जीवन,
आपां सीख ज्यावां।।
यह भजन संदेश देता है कि तप, संयम और त्याग से जीवन पवित्र बनता है। आत्मनियंत्रण, क्षमा और सादगी अपनाकर मनुष्य अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर सकता है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
