यह भजन हमें संसार की अस्थिरता और माया के बारे में सरल भाषा में समझाता है। इसमें बताया गया है कि दुनिया एक सपने जैसी है, जो पल-पल बदलती रहती है। जैसे पानी का बुलबुला जल्दी मिट जाता है, वैसे ही जीवन के सुख-दुख भी टिकते नहीं। जो पैदा होता है, वह नष्ट भी होता है और जो मिलता है, वह कभी न कभी बिछुड़ता है।
जगत सपनै री माया रे बादळिये-री-सी छाया रे
🎶 लय – सपना रे बैरी
✍🏻 रचयिता – आचार्यश्री तुलसी
जगत सपनै री माया रे,
बादळिये-री-सी छाया रे।
ज्यूं पाणी रा बुलबुला,
क्षण-क्षण बण-बण विललाय।।
उगै सो ही आथमै रे,
फूलै सो कुम्हलाय।
जो मिलसी बो बिछुड़सी रे,
ओ नियती रो न्याय।।
खिण हंसणो खिण रोवणो रे,
जग-स्वरूप रो सूत्र।
आंख झांक शिशु समझियो रे,
थावच्चा रो पुत्र।।
मुश्किल तांतो तोड़णो रे,
संस्कारां रो सैण।
‘बाबोजी बकरी मरयां रै,
रो-रो खोया नैण’।।
दुख में स्यूं सुख ढूंढलै रे,
धार्मिकता रो चिह्न।
और अधार्मिक री हुवै रे,
भाव-भंगिमा भिन्न।।
है संयोग वियोग रो रे,
अविनाभावी योग।
‘तुलसी’ आ दुविधा टलै रे,
संजम रै संयोग।।
यह भजन सिखाता है कि जीवन में सुख-दुख आते-जाते रहते हैं। इन सबके बीच संयम और सही सोच बनाए रखना ही सच्चा धर्म है। यही समझ हमें शांति और स्थिरता देती है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
