गुरुवर! जीवन में आध्यात्मिक संस्कार चाहिए (Guruvar! Jivan Mein Adhyatmik Sanskar Chahiye)

यह प्रेरणादायक गीत आचार्य तुलसी के उन महान विचारों को व्यक्त करता है, जिनमें आध्यात्मिकता, संस्कार, संस्कृति और चरित्र निर्माण का संदेश निहित है। इसमें नई पीढ़ी को सदाचारी, जागरूक और मूल्यनिष्ठ बनाने की प्रेरणा दी गई है। गीत बताता है कि केवल बाहरी प्रगति पर्याप्त नहीं, बल्कि जीवन में आत्मिक बल, सही चिंतन और दृढ़ आस्था का विकास भी आवश्यक है। 

 

गुरुवर! जीवन में आध्यात्मिक संस्कार चाहिए

🎶 लय – यह है जगने की बेला

✍🏻 रचयिता – साध्वीप्रमुखा महाश्रमणीजी

 

गुरुवर! 

जीवन में आध्यात्मिक संस्कार चाहिए। 

हृदय अविकार चाहिए, 

कि मन निर्धार चाहिए।।

 

नवपीढ़ी हो संस्कारी, 

उत्कट अभिलाष तुम्हारी। 

उसको सात्विक सुन्दर व्यवहार चाहिए।। 

 

जिस युग में प्रभु तुम आए, 

लहरें जागृति की लाए। 

उस युग की एक मधुर झंकार चाहिए।।

 

संरक्षण हो संस्कृति का, 

संवर्धन अपनी धृति का। 

दुर्बलता का समुचित प्रतिकार चाहिए।।

 

चिन्तन निर्णय में बदले, 

जड़ता के हिमगिरि पिघले। 

आस्था को अब सम्यक् आधार चाहिए।।

 

कांटों में कदम बढ़ाए, 

तम को आलोक बनाए। 

ऐसे आत्मिक बल का विस्तार चाहिए।।

 

तुमने संबोध दिया जो, 

पग-पग प्रतिबोध दिया जो। 

उसका अब फिर से साक्षात्कार चाहिए।।

 

सपने सुकुमार तुम्हारे, 

पूरे करने हैं सारे। 

ऊर्जा में पौरुष का संचार चाहिए।।

 

यह गीत आध्यात्मिक जागरण, संस्कार और आत्मबल का सुंदर संदेश देता है। आचार्य तुलसी के आदर्शों को अपनाकर व्यक्ति अपने जीवन को श्रेष्ठ बना सकता है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏