यह भजन आचार्यश्री तुलसी द्वारा रचित है। इसमें एक महान तपस्वी मुनि के तप, संयम, समता और सेवा-भावना की महिमा का वर्णन किया गया है। कवि बताते हैं कि कठोर साधना और आत्मअनुशासन से जीवन महान बनता है। ऐसे संतों का नाम युगों तक श्रद्धा से लिया जाता है। यह भजन हमें तप, त्याग, स्वाध्याय और धर्ममार्ग पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देता है।
घोर तपसी हो मुनि! घोर तपसी
🎶 लय – ओर रंग दे रे बाल्या
✍🏻 रचयिता – आचार्यश्री तुलसी
घोर तपसी हो मुनि! घोर तपसी,
थांरो नाम उठ-उठ जन भोर जपसी,
हो मुनि!
घोर तपसी हो सुख घोर तपसी!
थांरो जाप जप्यां करमां री कोड़ खपसी
हो मुनि!
दो सौ बरसां री भारी ख्यात है बणी,
थांरो नाम मोटा तपस्यां रै साथ फबसी,
हो मुनि!
ओ अनशन आ सहज समता,
लाखां लोगां रे दिलां में थांरी छाप छपसी,
हो मुनि !
काया पर कुल्हाड़ी ब्हाणी काम करड़ो,
सोरी पाटां ऊपर बैठ करणी गपशप सी,
हो मुनि!
तपस्या आतापना स्वाध्याय करणी,
थांरी सेवा-भावना रै लारै सारा दबसी,
हो मुनि!
स्वामीजी रो शासन तप-संयम री सुरसरी,
इण में न्हावसी जकां रो सारो पाप धुपसी,
हो मुनि!
आपणै शासण री संतां! चढ़ती कला,
इण में घणां ही तप्या है और घणां तपसी,
हो मुनि!
शिखर चढ्या है और चढ़ता ही रहसी,
गण रो शीष आभै, पैर जा पाताल रुपसी,
हो मुनि!
इण स्यूं विमुख अवनीत जो होसी!
बां रै भाग रो भानूड़ो जा छिती में छुपसी,
हो मुनि!
संजम-जीवन जीवो पंडित-मरण मरो,
थांरै दोन्यूं हाथां लाडू, खावो खुशी रे खुशी,
हो मुनि!
लंघी लम्बी यात्रा मंगल फागण बदी,
‘सुख’ साधना सुखदाई गाई गणी ‘तुलसी’
हो मुनि !
यह भजन सिखाता है कि तप, संयम और समता से जीवन उज्ज्वल बनता है। संतों का आदर्श मार्ग आत्मकल्याण का मार्ग है। उनके गुणों को अपनाकर मनुष्य अपना जीवन सफल बना सकता है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
