यह भजन आचार्यश्री तुलसी द्वारा रचित है। इसमें गजसुकुमाल मुनि के अद्भुत धैर्य, तप, सहनशीलता और आत्मबल का वर्णन किया गया है। दीक्षा लेने के बाद उन्होंने कठोर साधना की और भयंकर उपसर्ग सहते हुए भी समता नहीं छोड़ी। यह रचना हमें सिखाती है कि आत्मा की शक्ति शरीर से कहीं बड़ी है तथा क्षमा, संयम और वैराग्य जीवन के सच्चे आभूषण हैं।
धन्य गजसुकुमाल मुनि ध्यान धरै
🎶 लय – सरवर पाणीड़ै मैं जाऊं
✍🏻 रचयिता – आचार्यश्री तुलसी
धन्य गजसुकुमाल मुनि ध्यान धरै,
ऊभा अटल श्मशान गुण-ज्ञान भरै।
ज्ञान भरै अघ शान हरै।।
जिण ही दिन दीक्षा लीन्ही,
जिनवर नेमी पास,
उण ही दिन कीन्हों,
दारुण-साधना-अभ्यास।
पडिमा बारवीं भिखू,
की अंगीकार करै।।
जीवित ही कीन्हो अपणै,
अंग को उत्सर्ग,
खड्यो एक ठोर,
ठा कठोर कायोत्सर्ग।
आयो सुसरो सोमिल,
विप्र पूरब वैर सुमरै।।
वर्ण-ज्येष्ठ बाज की,
है दुष्टता कमाल,
सन्त शीष खीरा धरया,
बांध माटी-पाल।
चटकै करतो यूं,
चंडाल या कसाई भी डरै।।
हा! हा! रे पापी!,
करयो पाप कित्तो घोर?
सींग-पूंछ स्थान,
दाढ़ी-मूंछ वालो ढोर।
पायी आ ही है,
अधिकाई नहिं घास चरै।।
रोम-रोम दाह लागी,
सन्त कै शरीर,
तो भी ‘आह-ओह’ शब्द,
कियो ना सधीर।
जूझै जोधां ज्यूं,
अडोल वीर-वृत्ति बावरै।।
खधबध-खधबध कर,
सिर सीझै जाणै खीचड़ो,
तो भी अंग अविचल है,
मुकाबलो कड़ो।
अन्तर-भाव की दृढ़ताई,
कविजन कल्पना-परै।।
रे रे चेतनिया! तनिया!,
मत ना हो अधीर,
तू ही कब ही किण ही रे,
करी हूसी पीर?
आ है सोलह आना,
साच जो ही करै सो भरै।।
ज्यादा-ज्यादा वेदना,
तो नरकां में सही,
एक ना अनेक ना,
अनन्त बार ही।
त्राही-त्राही की पुकार,
जियड़ा! मतना बिसरै।।
तू है ज्ञानवान,
ज्ञानशून्य थांरो गात,
गात रै सम्बन्ध स्यूं ही,
हुवै थांरी घात।
अब तूं बिलकुल रै,
चुपचाप देही जरै तो जरै।।
अपणी अत्ता कत्ता है,
विकत्ता है विचार,
शत्रु बा ही मित्र बा ही,
सुख-दुःख री दातार।
अपणी आत्मा सुधरै तो,
सारा काज सुधरै।।
ओ तो है उपकारी माथै,
बांध माटी पाल,
कर्म-माल पार,
करण बण्यो है दलाल।
मत द्वेष-भाव ल्याई,
उपकारी उपरै।।
किंचित भी कंप न,
तन में होणो चाहीजै,
आगी का जीव कोई,
क्यूं पीड़ाईजै?
देखै पीर जो पराई,
बो शिव-वास वरै।।
चींटी को चटको भी न,
शान्त सह्यो जाय,
इस्यै उपसर्ग में तो,
जुदा जीव काय।
तब ही ‘तुलसी’ बिना,
नाव भव-उदधि तरै।।
गजसुकुमाल मुनि का जीवन हमें विपरीत परिस्थितियों में भी शांत, दृढ़ और समभावी रहने की प्रेरणा देता है। यह भजन बताता है कि आत्मकल्याण का मार्ग सहनशीलता से ही प्रशस्त होता है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
