यह भावपूर्ण गीत परम पूज्य आचार्य तुलसी के महाप्रयाण के बाद शिष्य-हृदय में उठी विरह-वेदना, श्रद्धा और स्मृतियों का मार्मिक चित्रण करता है। इसमें गुरु के महान उपकारों, उनके लोककल्याणकारी कार्यों और जन-जन पर पड़े प्रभाव को याद किया गया है। गुरु-वियोग की पीड़ा, उनके दर्शन की तड़प और उनकी शिक्षाओं के प्रति समर्पण इस रचना में सहज रूप से व्यक्त हुआ है।
गणदेव! मोरिया मन रा आज बुलावै आर्यदेव!
🎶 लय – उमराव! थांरी बोली
✍🏻 रचयिता – साध्वीप्रमुखा महाश्रमणीजी
गणदेव!
मोरिया मन रा आज बुलावै आर्यदेव!
गणदेव!
तुलसी नित उठ रटन लगावै आर्यदेव!
गणदेव!
खिण-खिण तुलसी-तुलसी ध्यावै आर्यदेव!
लाखां लोगां पर कर्यो,
शासण शासण-नाथ,
कोड़ा रै दिल में बस्या,
हुयो जमानो साथ।
गुरुदेव!
जस रा गीत समीर सुणावै आर्यदेव!
पुण्याई रा पोरसा,
मोड़ी युग री धार,
गण गिगनारां पर चढ्यो,
ओ थांरो उपकार।
गुरुदेव!
अब ओ करजो किंयां चुकावै आर्यदेव!
अस्थिर ओ संसार है,
पढ़ी शास्त्र में बात,
देखी आंख्यां काळ री,
निष्ठुरता साक्षात।
गुरुदेव!
बै स्मृतियां ही दिल दहलावै आर्यदेव!
दरियो इमरत स्यूं,
भर्यो लहरातो दिन-रात,
मीन पियासी नीर में,
साची निकळी बात।
गुरुदेव!
म्हारी स्याणप अब पिछतावै आर्यदेव!
खुलती पलकां फैलतो,
आतप और उजास,
खुल्या नयण बै एक दिन,
करग्या जगत हताश।
गुरुदेव!
बा आसाढ़ी तीज सिदावै आर्यदेव!
महाप्राण प्रस्थान सुण,
रुकी विश्व री सांस,
अटक्या बोल जुबान में,
पड़ी गलै में फांस।
गुरुदेव!
सोच्यो कुणं आ खबर उड़ावै आर्यदेव !
धुंधलो धुंधलो सो हुयो,
सूरज मध्य दुफेर,
दबै पांव झट मौत भी,
आई अवसर देख।
गुरुदेव!
धरती अम्बरियो कुरलावै आर्यदेव!
एक-एक वासर गिण्यो,
बीत्यो पूरो साल,
दरसण दिया न आर्यवर,
हुयो हाल-बेहाल।
गुरुदेव!
अडिकां कद संभाल लिरावै आर्यदेव!
अन्तिम शिक्षा रूप में,
लिख्यो न कोई लेख,
महाप्रज्ञ! अनुशासना ल्यो,
निज निजरां देख।
गुरुदेव!
गण आस्था रो अर्घ्य चढ़ावै आर्यदेव!
यह गीत गुरु-वियोग की गहन संवेदना और श्रद्धा का सुंदर स्वर है। आचार्य तुलसी की स्मृतियां, आदर्श और अनुशासन आज भी साधकों को प्रेरित करते हैं तथा उनके जीवन-पथ को आलोकित बनाते हैं।
🙏जय जिनेंद्र🙏
