भिक्षु अष्टकम् स्तोत्र आचार्य श्री महाप्रज्ञ द्वारा रचित एक प्रेरणादायक संस्कृत स्तुति है, जो आचार्य भिक्षु के महान व्यक्तित्व, दृढ़ संकल्प, समता, त्याग, साधना और आत्मजागरण का सुंदर वर्णन करती है। इस स्तोत्र में उनके जीवन के आदर्श गुणों को सरल और भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। इसका अध्ययन हमें संयम, शांति, सहनशीलता और आत्मविकास की प्रेरणा देता है।
भिक्षु अष्टकम् स्तोत्र - अर्थ सहित
✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री महाप्रज्ञ
[आचार्य भिक्षु के 188वें निर्वाणोत्सव पर सिरियारी में आचार्य श्री महाप्रज्ञ द्वारा समुच्चारित]
अकम्पः संकल्पः क्वचिदपि न केनापि चलितः,
न चित्ते चाञ्चल्यं न च विपथगामीन्द्रियगणः।
समं सोढं गालिः क्वचन घनमुष्टेः प्रहरणं,
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
न रागो न द्वेषो घटितघटनासु प्रतिकृतः,
विरोधः सद्भावे परिणतिमुपागात् प्रतिपदम्।
न लेशः क्लेशानां समजनि निमेषं सहचरः,
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
अलब्धेऽप्याहारे सुमतिरचलन्नो क्षणमपि,
न लब्धं सुस्थानं तदपि पथि नीते स्थिरमतिः।
न कष्टं तत्कष्टं भवति यदि चित् स्पष्टमुदिता,
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
सदा स्वच्छो भावो जिनवचनभावैरपमलः,
कृतादर्शा प्रज्ञा मतिविभवमाक्रम्य सुगता।
न चेर्ष्या नो निन्दा गहनतमनिष्ठा स्वचरिते,
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
न सा काम्या बुद्धिर्भवति खलु या बन्धनिरता,
प्रशस्यां तां मन्ये भवति च यतश्चिद् विकसिता।
स्वचैतन्ये निष्ठा प्रशमसुखवृष्टेरनुभवः,
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
ज्वरो यस्याध्वानं सततमविगानं विहितवान्,
निराशा संन्यस्ता सरिति रवितापेन सुतराम्।
प्रकाशः संप्राप्तो गहनतिमिरे चित्तनिलये,
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
अगम्यं यन्नाम प्रबलतपसा संचितयशो,
न शेषाः संक्लेशाः विलयमुपयान्ति स्मरणतः।
नयन् ॐ ह्रीं ॐ ॐ अमलमनसा र्हं सवलयम्,
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
मतिः सिद्धा शुद्धा भवतु प्रतिबुद्धा प्रतिपलं,
मनो हित्वा भ्रान्तिं व्रजतु सुखदां शान्तिममलाम्।
सदा र्हं र्हं र्हं र्हं स्फुरतु नितरां भावनिचये,
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
भिक्षु अष्टकम् स्तोत्र का अर्थ (Hindi & English Meaning)
अकम्पः संकल्पः क्वचिदपि न केनापि चलितः,
उनका संकल्प इतना दृढ़ था कि उसे कोई भी परिस्थिति कभी डिगा नहीं सकी।
His resolve was so firm that no circumstance could ever shake it.
न चित्ते चाञ्चल्यं न च विपथगामीन्द्रियगणः।
उनके मन में कोई चंचलता नहीं थी और उनकी इन्द्रियाँ कभी गलत मार्ग पर नहीं गईं।
There was no restlessness in his mind, and his senses never strayed from the right path.
समं सोढं गालिः क्वचन घनमुष्टेः प्रहरणं,
उन्होंने गालियाँ और कठोर प्रहार दोनों को समान भाव से सहन किया।
He endured insults and even harsh physical blows with equal composure.
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
वे प्रसन्नचित्त आचार्य भिक्षु मेरी आँखों के सामने साकार रूप में अवतरित हों।
May the serene Acharya Bhikshu manifest before my eyes.
न रागो न द्वेषो घटितघटनासु प्रतिकृतः,
घटित घटनाओं के प्रति उनके मन में न राग था और न द्वेष।
He neither developed attachment nor hatred toward events that occurred.
विरोधः सद्भावे परिणतिमुपागात् प्रतिपदम्।
विरोध भी उनके सद्भाव के कारण हर कदम पर सौहार्द में बदल जाता था।
Even opposition transformed into goodwill through his noble attitude.
न लेशः क्लेशानां समजनि निमेषं सहचरः,
कष्टों का एक क्षण के लिए भी उनके साथ संबंध नहीं बन पाया।
Afflictions could not remain with him even for a moment.
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
वे प्रसन्नचित्त आचार्य भिक्षु मेरी आँखों के सामने साकार रूप में अवतरित हों।
May the serene Acharya Bhikshu manifest before my eyes.
अलब्धेऽप्याहारे सुमतिरचलन्नो क्षणमपि,
भोजन न मिलने पर भी उनकी सद्बुद्धि एक क्षण के लिए भी विचलित नहीं हुई।
Even when food was unavailable, his wisdom never wavered.
न लब्धं सुस्थानं तदपि पथि नीते स्थिरमतिः।
उचित स्थान न मिलने पर भी यात्रा में उनका मन स्थिर बना रहा।
Even without a suitable place to stay, he remained mentally steady during his travels.
न कष्टं तत्कष्टं भवति यदि चित् स्पष्टमुदिता,
यदि मन स्पष्ट और प्रसन्न हो तो कष्ट भी कष्ट नहीं लगता।
When the mind is clear and cheerful, suffering no longer feels painful.
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
वे प्रसन्नचित्त आचार्य भिक्षु मेरी आँखों के सामने साकार रूप में अवतरित हों।
May the serene Acharya Bhikshu manifest before my eyes.
सदा स्वच्छो भावो जिनवचनभावैरपमलः,
उनके भाव सदैव निर्मल थे और जिनवाणी से शुद्ध बने रहे।
His feelings were always pure and refined by the teachings of the Jinas.
कृतादर्शा प्रज्ञा मतिविभवमाक्रम्य सुगता।
उनकी प्रज्ञा आदर्श बनकर ज्ञान की ऊँचाइयों तक पहुँची।
His wisdom became exemplary and attained great intellectual heights.
न चेर्ष्या नो निन्दा गहनतमनिष्ठा स्वचरिते,
उनके आचरण में न ईर्ष्या थी, न निन्दा और अपने चरित्र में गहनतम निष्ठा थी।
There was neither jealousy nor criticism, but the deepest dedication to his own conduct.
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
वे प्रसन्नचित्त आचार्य भिक्षु मेरी आँखों के सामने साकार रूप में अवतरित हों।
May the serene Acharya Bhikshu manifest before my eyes.
न सा काम्या बुद्धिर्भवति खलु या बन्धनिरता,
वह बुद्धि प्रशंसनीय नहीं है जो बन्धनों में फँसी रहती है।
A mind attached to bondage is not truly worthy.
प्रशस्यां तां मन्ये भवति च यतश्चिद् विकसिता।
वही बुद्धि प्रशंसनीय है जो विकसित और जागृत हो।
Only that intellect is admirable which is developed and enlightened.
स्वचैतन्ये निष्ठा प्रशमसुखवृष्टेरनुभवः,
अपने आत्मचैतन्य में स्थित होकर उन्होंने शांति और सुख की वर्षा का अनुभव किया।
Established in self-awareness, he experienced a shower of peace and happiness.
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
वे प्रसन्नचित्त आचार्य भिक्षु मेरी आँखों के सामने साकार रूप में अवतरित हों।
May the serene Acharya Bhikshu manifest before my eyes.
ज्वरो यस्याध्वानं सततमविगानं विहितवान्,
ज्वर (बुखार) ने जिनके मार्ग को घेरा, फिर भी वे निरंतर बिना रुके चलते रहे।
Even when fever obstructed his path, he continued his journey without hesitation.
निराशा संन्यस्ता सरिति रवितापेन सुतराम्।
कठोर धूप और कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने निराशा का त्याग कर दिया।
Even under harsh sunlight and difficult conditions, he cast away despair.
प्रकाशः संप्राप्तो गहनतिमिरे चित्तनिलये,
उन्होंने अज्ञान के गहरे अंधकार में भी अंतर्मन का प्रकाश प्राप्त किया।
He attained inner light even amidst the deepest darkness of ignorance.
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
वे प्रसन्नचित्त आचार्य भिक्षु मेरी आँखों के सामने साकार रूप में अवतरित हों।
May the serene Acharya Bhikshu manifest before my eyes.
अगम्यं यन्नाम प्रबलतपसा संचितयशो,
जिनका नाम महान तपस्या और अर्जित यश के कारण अत्यंत गौरवशाली है।
His name became glorious through intense austerity and earned fame.
न शेषाः संक्लेशाः विलयमुपयान्ति स्मरणतः।
जिनके स्मरण मात्र से कोई भी दुःख और क्लेश शेष नहीं रहता, सब विलीन हो जाते हैं।
By merely remembering him, all sorrows and afflictions dissolve completely.
नयन् ॐ ह्रीं ॐ ॐ अमलमनसा र्हं सवलयम्,
निर्मल मन से दिव्य मंत्रों का स्मरण करते हुए साधक आगे बढ़े।
With a pure mind, the seeker moves forward while contemplating the sacred mantras.
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
वे प्रसन्नचित्त आचार्य भिक्षु मेरी आँखों के सामने साकार रूप में अवतरित हों।
May the serene Acharya Bhikshu manifest before my eyes.
मतिः सिद्धा शुद्धा भवतु प्रतिबुद्धा प्रतिपलं,
हमारी बुद्धि प्रत्येक क्षण शुद्ध, सिद्ध और जागृत बनी रहे।
May our intellect remain pure, accomplished, and awakened every moment.
मनो हित्वा भ्रान्तिं व्रजतु सुखदां शान्तिममलाम्।
हमारा मन भ्रम छोड़कर निर्मल और सुखद शांति को प्राप्त करे।
May the mind abandon delusion and attain pure, blissful peace.
सदा र्हं र्हं र्हं र्हं स्फुरतु नितरां भावनिचये,
हमारे भावों में सदैव अर्हम् मंत्र की पवित्र ध्वनि गूँजती रहे।
May the sacred vibration of Arham always resonate within our thoughts.
प्रसन्नात्मा भिक्षुर्नयनमवतारं नयतु मे।।
वे प्रसन्नचित्त आचार्य भिक्षु मेरी आँखों के सामने साकार रूप में अवतरित हों।
May the serene Acharya Bhikshu manifest before my eyes.
यह स्तोत्र घंटाकर्ण महावीर की रक्षा-शक्ति और करुणा को प्रकट करता है। श्रद्धा से इसके पाठ और स्मरण से भय, रोग और बाधाएँ दूर होती हैं तथा साधक के जीवन में शांति और सुरक्षा बनी रहती है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
