आखिर तो जाणो पड़सी – मत कर रे तूं मोह जगत स्यूं (Aakhir To Jaano Padsi – Mat Kar Re Tu Moh Jagat Syu)

यह भजन जीवन की नश्वरता और संसार के मोह से बचने का गहरा संदेश देता है। साध्वी राजीमतीजी ने सरल शब्दों में समझाया है कि धन, परिवार, शरीर और प्रतिष्ठा सब यहीं रह जाते हैं। मनुष्य को अपने कर्मों की जिम्मेदारी स्वयं उठानी पड़ती है। इसलिए प्रभु भक्ति, आत्मजागृति और सही मार्ग पर चलकर जीवन को सार्थक बनाना ही सच्ची बुद्धिमानी है। 

 

आखिर तो जाणो पड़सी - मत कर रे तूं मोह जगत स्यूं

🎶 लय – सुण सुण रे

✍🏻 रचयिता – साध्वी राजीमतीजी

 

मत कर रे, मत कर रे, 

मत कर रे तूं मोह जगत स्यूं, 

आखिर तो जाणो पड़सी।।

 

सुख स्यूं जीणो, सुख स्यूं मरणो, 

अरिहन्तां रो साचो शरणो। 

बेटा पोता के करसी, 

आखिर तो जाणो पड़सी।।

 

चार दिनां री चमक चान्दणी, 

पीढ्यां री के आस बांधणी। 

खुद री करणी खुद भरसी, 

आखिर तो जाणो पड़सी।।

 

जड़ चेतन रो भेद समझलै, 

तन रो नश्वर रूप देखलै। 

चाल्यां स्यूं मंजिल मिलसी, 

आखिर तो जाणो पड़सी ।।

 

कसरत कर काया चमकाई, 

माखण दूध मलाई खाई। 

कुण जाण्यो अरथी बणसी, 

आखिर तो जाणो पड़सी।।

 

क्रोड़ कमाया, क्रोड़ गमाया, 

लाखां ऊपर रोब जमाया। 

अंत बराबर सब होसी, 

आखिर तो जाणो पड़सी।।

 

चेत-चेत अब चेत चेतना, 

अब तक भोगी किती वेदना। 

प्रभु भजन स्यूं दुःख मिटसी, 

आखिर तो जाणो पड़सी।।

 

यह भजन हमें मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मकल्याण की राह अपनाने की प्रेरणा देता है। अंत में साथ केवल कर्म जाते हैं, इसलिए प्रभु स्मरण और जागृत चेतना से जीवन को सफल बनाना चाहिए। 

🙏जय जिनेंद्र🙏