यह सुंदर साधुवंदना हमें सच्चे साधु के महान गुणों का स्मरण कराती है। इसमें उनके पंच महाव्रत, जीव दया, संयम, ज्ञान, वैराग्य, त्याग और सेवा का वर्णन है। साधु संसार के मोह से दूर रहकर आत्मकल्याण का मार्ग दिखाते हैं। उनकी वंदना, सेवा और उपदेश सुनने से जीवन में अच्छे संस्कार आते हैं और आत्मा को शांति, शक्ति तथा सही दिशा हर दिन मिलती है।
साधुवंदना - साधुजी ने वंदना नित-नित कीजै
🎶लय – वीर पधार्या राजगृह में
साधुजी ने वंदना नित-नित कीजै,
प्रह ऊगन्ते सूर रे, प्राणी।
नीच गती मां ते नवि जाये,
पामै ऋद्धि भरपूर रे, प्राणी।।
मोटा ते पंच महाव्रत पाले,
छःकाय रा प्रतिपाल रे, प्राणी।
भ्रमर भिक्षा मुनि सूजती लेवे,
दोष बंयालिस टाल रे, प्राणी।।
ऋद्ध सम्पद मुनि कारमी जाणै,
दीधी संसार ने पूठ रे, प्राणी।
आं पुरुषां री बनणा करतां,
आठूं कर्म जाए टूट रे, प्राणी।।
इक-इक मुनिवर रस नां त्यागी,
एकेक ज्ञान भण्डार रे, प्राणी।
इक-इक मुनि व्यावचिया वेरागी,
एहना गुणा नो नावे पार रे, प्राणी।।
गुण सत्ताबीस करी ने दीपै,
जीत्या परीषह बावीस रे, प्राणी।
बावन तो अनाचारज टाले,
तेनै नमावू म्हारो शीश रे, प्राणी।।
जहाज समान ते सन्त मुनीश्वर,
भवि जीव बैसे त्यां जाय रे, प्राणी।
पर उपकारी दाम न मांगे,
देवे ते मुगति पहुंचाय रे, प्राणी।।
ए चरणे प्राणी सुख पावै,
पावै ते आत्मविलास रे, प्राणी।
जन्म जरा अने मरण मिटावै,
नावे फिरी गर्भावास रे, प्राणी।।
एक वचन ए सतगुरु केरा,
जो बेसे दिल मांय रे, प्राणी।
नरक गती मां ते नवि जाये,
एम कहे जिनराय रे, प्राणी।।
प्रात उठी ने उत्तम प्राणी,
सुणै साधां रो व्याख्यान रे, प्राणी।
आं पुरुषां री सेवा करतां,
पावे अमर विमान रे, प्राणी।।
संवत अठारह वर्ष अड़तीसे,
बूसी गाम चौमास रे, प्राणी।
मुनी आसकरण इम जंपै,
हूं तो उत्तम साधां रो दास रे, प्राणी।।
यह साधुवंदना हमें साधु के गुणों को समझने, आदर करने और बताए मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। संयम, सेवा, त्याग और सत्संग से जीवन सुधरता है और आत्मा कल्याण की ओर बढ़ती है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
