यह गीत स्वामीजी के जीवन, मर्यादा और तेरापंथ की गौरवमयी यात्रा का बहुत भावपूर्ण वर्णन करता है। इसमें उनके आगमन, समकित के प्रकाश, संघ की स्थापना, मर्यादा की मजबूत नींव और अनेक ऐतिहासिक प्रसंगों का स्मरण है। जोधपुर, केलवा और अन्य स्थानों से जुड़े प्रसंग इस रचना को विशेष बनाते हैं। गीत श्रद्धा, इतिहास और गुरु भक्ति को बहुत सरल भाव से प्रस्तुत करता है।
जीवन रो, कांई है भरोसो भाई जीवन रो?
🎶लय – म्हांरो केसरियो हंजारी
स्वामी! आया-आया गढ़ गिगनारां आपरै।
स्वामी! मुलकै-मुलकै जोधाणां री हाट।
समकित रो करग्या चांनणो।
स्वामी! धोरां री धरती पर उग्यो चांद।
समकित रो करग्या चांनणो।।
स्वामी! मर्यादा री गहरी नींवा गाड़ग्या।
स्वामी! तेरापंथ बण्यों है, गण गुलजार।।
स्वामी! बत्तीसै रो, बो विधान मन भावतो।
बांधी हिन्दमहासागर पर अद्भुतपाल।।
स्वामी! पत्र बण्यो है, छत्र संघ सिर सेहरो।
स्वामी! तेरापंथ शासण रो, ओ आधार।।
स्वामी! तेरह मांस्यूं, सात गया, छव ही रह्या।
लिखदी! स्वर्णाक्षर में, कलमां जो कल्लदार।।
स्वामी! पहलो तो चौमासो, करियो केलवे।
बणग्यो अंधेरी-ओरी रो, बो इतिहास।।
स्वामी! अट्ठारै साठै रो, पावस दीपतो।
स्वामी! कच्ची-पक्की, हाटां रो इतिहास।।
स्वामी! पक्की हाट पधार्या, अणसण आदर्यो।
स्वामी! दर्शन री लागी भक्तां री भीड़।।
गावै मुनि सुरेश मर्यादा मोछव रंग जम्यो।
स्वामी! जोधाणें में चार तीरथ रा ठाट।।
यह रचना स्वामीजी के तप, मर्यादा, समकित और संघ निर्माण के कार्यों को याद करती है। उनके जीवन के प्रेरक प्रसंग भक्तों में श्रद्धा जगाते हैं और तेरापंथ की गौरवपूर्ण परंपरा का स्मरण कराते हैं।
🙏जय जिनेंद्र🙏
