माटी री मूरत है काया क्यूं तूं देख लुभायो? (Maati Ri Murat Hai Kaya Kyun Tu Dekh Lubhayo?)

यह भजन हमें जीवन की सच्चाई बहुत सरल ढंग से समझाता है। हमारा शरीर मिट्टी से बना है और एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा। इसलिए रूप, धन, मान और माया पर घमंड नहीं करना चाहिए। मनुष्य को सदा अच्छे कर्म करने चाहिए, दूसरों को दुख नहीं देना चाहिए और समय रहते अपने मन का द्वार खोलकर सत्य, भलाई और ईश्वर को भी समझना चाहिए। 

 

माटी री मूरत है काया क्यूं तूं देख लुभायो?

🎶लय – मिलो न तुम तो हम घबरायें

 

माटी री मूरत है काया, क्यूं तूं देख लुभायो?

किंवाड़ी खोल हियै री।

झूठी सारी ममता माया, थोथै भरम भुलायो,

किंवाड़ी खोल हियै री।।

 

जीणो है थोड़ो सो, 

किसी बात पर तूं बण्यो आकरो?

खावै पंसेरी रो, 

फैके जो दूजां ऊपर कांकरो, 

करै जको ही भरै जगत में, 

क्यूं तूं समझ न पायो।।

 

ढीलो भलाई में तू, 

घणो है बुराई में उंतावळो, 

स्याणो कहावै कोरो, 

कामां स्यूं लागे पूरो बावळो, 

सुलझण चाल्यो पण उलझण में, 

खुद ने खुब फंसायो।।

 

टिम-टिम करतो थारो, 

दियो जिन्दगी रो बुझ जावैला, 

अंधेरो घिरेला जद, 

कोई न पूछण वाळो आवैला, 

सुख रो ही साथी जग सारो, 

दुख स्यूं है घबरायो।।

 

चालै है सांस जित्तै, 

सघलां नै लागै तूं सुहावणो, 

रूकतां ही होवैला, 

हर पल भारी अणखावणो, 

‘बुद्ध’ हुवैला साथी थारो, 

जो पुण्य पाप कमायो।।

 

अंत में यह भजन हमें याद दिलाता है कि जीवन बहुत छोटा है। संसार के साथी हमेशा साथ नहीं रहते। हमारे अच्छे और बुरे कर्म ही अंत तक साथ चलते हैं, इसलिए भलाई करनी चाहिए। 

🙏जय जिनेंद्र🙏