यह रचना तपस्या की शक्ति, साहस और आत्मबल का सुंदर वर्णन करती है। इसमें बताया गया है कि सच्ची तपस्या मनुष्य को मजबूत बनाती है और उसके कठिन कर्मों को दूर करने में सहायक होती है। अनेक महान तपस्वियों के उदाहरण देकर तपस्या की महिमा समझाई गई है। यह रचना संतों के गुण, समता, सेवा, त्याग और अच्छे संस्कारों का संदेश देती है।
गुण घुंघरू छम छमा छम - तपस्या री अनुपम महिमा
🎶लय – घुंघरू छम छमा छम
गुण घुंघरू छम छमा छम
छण छण ण ण ण ण ण ण बाजै रै बाजे रै।
तपस्या री अनुपम महिमा जन जन में राजै रै।।
निज रै तन स्यूं जंग जबर ओ,
जीतै कोइक शूर।
तप तलवार बजै हाडां पर,
कायर भागे दूर।।
तपसी रे तो खेल तपस्या,
तन रो निकळे तेल।
वज्र जिसो मजबूत बण्यां ही,
कटै कर्म री बेल।।
अमी, भीम, राम, शिव, कोदर,
बड़ा तपस्वी नाम।
अन्तर भावां स्यूं जो समरै,
सरै अचिंत्या काम।।
घोर तपस्वी सुख सुखदाता,
वृद्धि-सिद्धि दातार।
अगम साहसी उगम जगावै,
सब रा शुभ संस्कार।।
रंभा, जेतां, झूमां, मुक्खां,
छोगां, वदना मात।
चांदा, प्यारा, भूरां अणचां,
पन्ना तपसण ख्यात।।
तुलसी चरण शरण में तीखो,
तरूण तपस्वी संत।
पारस नै पारस बणनो है,
समतामय गुणवंत।।
योगक्षेम बरस में मिलगी,
आ संता री ओळ।
‘बुद्ध’ भरी है मासखमणा पर,
पारस! थांरी खोळ।।
यह रचना हमें सिखाती है कि तपस्या, साहस, अच्छे संस्कार और समता से जीवन श्रेष्ठ बनता है। सच्चे संत अपने आचरण से दूसरों को प्रेरणा देते हैं और मानवता का मार्ग दिखाते हैं।
🙏जय जिनेंद्र🙏
