यह भजन हमें अपने जीवन को सुधारने की सरल और सच्ची सीख देता है। इसमें बताया गया है कि जब हमारा व्यवहार अच्छा होता है, तो हमें पूरा संसार भी अच्छा दिखाई देता है। अहंकार छोड़कर, अच्छे कर्म करके और समय का सही उपयोग करके ही जीवन सफल बनता है। यह रचना आत्मचिंतन, जागरूकता और सत्कर्म का सुंदर संदेश देती है।
थांरो सुधरैला जद व्यवहार सारो संसार सुधर ज्यासी
🎶 लय – आ लौट के आजा मेरे मीत
थांरो सुधरैला जद व्यवहार,
सारो संसार सुधर ज्यासी।
थांरो बिखरैला जद अंहकार,
सारो अंधार बिखर ज्यासी।।
गुण है घणा ही अवगुण घणा ही,
जग बहुरंगी है मेळो,
आछा घणा ही भूंडा घणा ही,
दो दिन वाळो है खेलो,
तूं तो करले थांरो निस्तार।।
जनम-मरण री है आग भयंकर,
सगळा जबै सूका गीला,
कोई सहायक बण नहीं पावै,
गजब अठै री है लीला,
तूं तो होज्या नी झटपट पार।।
काळ अनंतो सूतै रो बीत्यो,
आँख खोलण नहीं पायो,
नई कमाई करी नहीं कोई,
बासी ही भोजन खायो,
किंयां होसी थांरो उद्धार।।
बीत्यो आउखो पाछो न आवै,
टूटयां कारी नहीं लागै,
टांडो लदैला जिण दिन थांरो,
पुण्य पाप जासी सागै,
‘बुद्ध’ भरले सुकृत रो भण्डार।।
यह भजन हमें याद दिलाता है कि समय लौटकर नहीं आता। इसलिए अहंकार छोड़कर अच्छे कर्म करें, अपना जीवन सुधारें और पुण्य का संचय करें। यही सच्चे सुख और कल्याण का मार्ग है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
