उपसर्गहर स्तोत्र – अर्थ सहित (Upsarghar Stotra – With Meaning)

उपसर्गहर स्तोत्र जैन धर्म का एक अत्यंत पूजनीय और लोकप्रिय स्तोत्र है, जिसकी रचना आचार्य भद्रबाहु स्वामी द्वारा मानी जाती है। यह स्तोत्र भगवान पार्श्वनाथ की स्तुति में रचा गया है। इसकी लघु रचना में प्रभु के गुणों का वर्णन करते हुए उनके स्मरण, भक्ति और प्रणाम के महत्व को बताया गया है। श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करने से मन को शांति, आत्मबल और आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त होती है। 

 

उपसर्गहर स्तोत्र - अर्थ सहित

उवसग्गहरं पासं, 

पासं वंदामि कम्मघणमुक्कं। 

विसहर-विसनिन्नासं, 

मंगल-कल्लाण-आवासं।।

 

विसहर-फुलिंग-मंतं, 

कंठे धारेइ, जो सया मणुओ। 

तस्स गह-रोग-मारी, 

दुट्ठजरा जंति उवसामं।।

 

चिट्ठउ दूरे मंतो, 

तुज्झ पणामो वि बहुफलो होइ। 

नरतिरिएसु वि जीवा, 

पावंति न दुक्ख-दोहग्गं।।

 

तुह सम्मत्ते लद्धे, 

चिंतामणि-कप्पपायवब्भहिए। 

पावंति अविग्घेणं, 

जीवा अयरामरं ठाणं।।

 

इय संथुओ महायस! 

भत्तिब्भर निब्भरेण हियएण। 

ता देव! दिज्ज बोहिं, 

भवे भवे पास जिणचंद।।

 

उपसर्गहर स्तोत्र का अर्थ (Hindi & English Meaning)

उवसग्गहरं पासं,
मैं उपसर्गों (कष्टों और बाधाओं) का नाश करने वाले पार्श्वनाथ प्रभु को वंदन करता हूँ।
I bow to Lord Parshvanath, who removes obstacles and sufferings.

 

पासं वंदामि कम्मघणमुक्कं।
मैं उन प्रभु को नमस्कार करता हूँ जो कर्मों के घने बंधनों से मुक्त हैं।
I bow to the Lord who is free from the heavy bondage of karma.

 

विसहर-विसनिन्नासं,
जो विष और विष से उत्पन्न संकटों का नाश करते हैं।
He destroys poison and the troubles caused by poison.

 

मंगल-कल्लाण-आवासं।।
जो मंगल और कल्याण के निवास स्थान हैं।
He is the abode of auspiciousness and welfare.

 

विसहर-फुलिंग-मंतं,
विष का नाश करने वाला यह प्रभावशाली मंत्र।
This powerful mantra destroys poison.

 

कंठे धारेइ, जो सया मणुओ।
जो मनुष्य इस मंत्र को सदा अपने कंठ में धारण (स्मरण/जप) करता है।
Whoever always holds this mantra in his throat, reciting and remembering it.

 

तस्स गह-रोग-मारी,
उसके ग्रहदोष, रोग और महामारियाँ।
His planetary afflictions, diseases, and epidemics.

 

दुट्ठजरा जंति उवसामं।।
तथा अन्य कष्ट शांत हो जाते हैं।
And other sufferings become pacified.

 

चिट्ठउ दूरे मंतो,
मंत्र की शक्ति की बात तो दूर रहे।
Let alone the power of the mantra itself.

 

तुज्झ पणामो वि बहुफलो होइ।
केवल आपको किया गया प्रणाम भी बहुत फलदायी होता है।
Even bowing to you alone brings great benefits.

 

नरतिरिएसु वि जीवा,
मनुष्य और तिर्यंच योनि के जीव भी।
Beings in human and animal forms as well.

 

पावंति न दुक्ख-दोहग्गं।।
दुःख और दुर्भाग्य को प्राप्त नहीं होते।
Do not suffer misery and misfortune.

 

तुह सम्मत्ते लद्धे,
आपके सम्यक्त्व को प्राप्त कर लेने पर।
Upon attaining right faith in you.

 

चिंतामणि-कप्पपायवब्भहिए।
जो चिंतामणि और कल्पवृक्ष से भी बढ़कर है।
Which is greater than a wish-fulfilling gem or celestial tree.

 

पावंति अविग्घेणं,
जीव बिना किसी बाधा के प्राप्त कर लेते हैं।
Souls attain without any obstacles.

 

जीवा अयरामरं ठाणं।।
अमर और शाश्वत मोक्ष पद को।
The eternal and immortal state of liberation.

 

इय संथुओ महायस!
हे महान यश वाले प्रभु! इस प्रकार आपकी स्तुति की गई है।
O greatly glorious Lord! Thus your praise is sung.

 

भत्तिब्भर निब्भरेण हियएण।
पूर्ण भक्ति से भरे हुए हृदय द्वारा।
With a heart completely filled with devotion.

 

ता देव! दिज्ज बोहिं,
इसलिए हे देव! मुझे बोधि (आध्यात्मिक जागृति) प्रदान करें।
Therefore, O Lord, grant me Bodhi (spiritual enlightenment).

 

भवे भवे पास जिणचंद।।
हे पार्श्व जिनचन्द्र! हर जन्म में मुझे आपका सान्निध्य मिले।
O Lord Parshva Jinchandra! May I remain close to you in every birth.

 

उपसर्गहर स्तोत्र की यह लघु रचना भगवान पार्श्वनाथ के प्रति श्रद्धा, भक्ति और समर्पण का सुंदर संदेश देती है। इसका भावपूर्वक चिंतन और पाठ आत्मकल्याण, शांति तथा आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏