यह प्रेरणादायक भजन तपस्या की महिमा और उसके आत्मिक प्रभाव को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है। साध्वी यशोधराजी ने बताया है कि तप केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि कर्मों को क्षीण करने, इन्द्रियों पर विजय पाने और आत्मोदय का मार्ग है। त्याग, स्वाध्याय, भक्ति और तप के माध्यम से जीवन में नई दिशा, शक्ति और उज्ज्वलता आती है। यही तप का सच्चा तेज है।
तप का है तेज निराला त्रिभुवन में भरे उजाला
🎶 लय – प्रज्ञा के दीप जलेगें
✍🏻 रचयिता – साध्वी यशोधराजी
तप का है तेज निराला,
त्रिभुवन में भरे उजाला।
प्रीत सुरंगी तप से जोड़लो,
हो बहनोंऽऽऽ।।
कर्म कटक से लोहा लेने,
विरले ही तप करते हैं,
शांत सुधा स्वाध्याय शुभंकर,
जाप प्रभु का जपते हैं।
दीपक से दीपक जलता,
तप का गुलशन है खिलता।।
इन्द्रिय विजय लक्ष्य है गहरा,
साध रहे निज काया को,
बंधन ढ़ीले पड़ जाते,
जब छोड़ें ममता माया को।
मन पर जिसकी असवारी,
आत्मोदय का अधिकारी।।
भिक्षु तपोवन में तपस्या से,
खिल रही केशर क्यारी है,
तरुण तपस्वी आचार्यों से,
विकसित गण फुलवारी है।
तप से गण नींवें गहरी,
तपसी है गण के प्रहरी।।
भाई बहिनों ने तपस्या से,
प्रीत अनूठी जोड़ी है।
त्याग तपोबल से धारा को,
नयी दिशा में मोड़ी है।
‘यशोधरा’ लो आज बधाई,
तपस्या से रौनक आई।।
यह भजन सिखाता है कि तप, त्याग और आत्मसंयम से जीवन प्रकाशित होता है। जो व्यक्ति ममता और मोह से ऊपर उठकर तप करता है, वह आत्मविकास, शांति और सच्चे कल्याण का अधिकारी बनता है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
