जो कुछ भी पाप हुआ मुझसे मिच्छा मि दुक्कडं लेता हूं (Jo Kuchh Bhi Paap Hua Mujhse Michchha Mi Dukkadam Leta Hoon)

यह भावपूर्ण गीत आत्मचिंतन, पश्चाताप और क्षमायाचना की भावना को व्यक्त करता है। इसमें साधक अपने ज्ञात-अज्ञात पापों, भूलों और दुष्कर्मों के लिए भगवान, गुरु और अपनी आत्मा को साक्षी मानकर क्षमा मांगता है। गीत हमें राग-द्वेष, मोह और प्रमाद से दूर रहकर सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् आचरण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। 

 

जो कुछ भी पाप हुआ मुझसे मिच्छा मि दुक्कडं लेता हूं

🎶 लय – वह धर्म नहीं बस धोखा है

✍🏻 रचयिता – मुनि शोभालालजी

 

जो कुछ भी पाप हुआ मुझसे, 

मिच्छा मि दुक्कडं लेता हूं, 

भगवान! आपकी साक्षी से, 

मिच्छा मि दुक्कडं लेता हूं, 

गुरुदेव! आपकी साक्षी से, 

मिच्छा मि दुक्कडं लेता हूं, 

अपनी आत्मा की साक्षी से, 

मिच्छा मि दुक्कडं लेता हूं।।

 

पंचाश्रव पाप अठारह का, 

जो सेवन किया कराया हो। 

इस भव में या पिछले भव में, 

मिच्छा मि दुक्कडं लेता हूं।।

 

कर्मों के कर्ता राग द्वेष, 

ये नाच नचाते हैं मुझको। 

इनके वश जो दुष्कर्म किये, 

मिच्छा मि दुक्कडं लेता हूं।।

 

कहां-कहां पर मैंने जन्म लिए? 

कहां-कहां पर कैसे मरण किये? 

है अता-पता कुछ भी न कहीं, 

मिच्छा मि दुक्कडं लेता हूं।।

 

कितनों से नाता जोड़ा है, 

कितनों से नाता तोड़ा है। 

उन सब से खमत-खामणा कर, 

मिच्छा मि दुक्कडं लेता हूं।।

 

जो मद-प्रमाद में पाप हुए, 

अनजान जान में पाप हुए। 

उन सब का आतम-साक्षी से, 

मिच्छा मि दुक्कडं लेता हूं।।

 

सम्यग्-दर्शन सद्ज्ञान-चरण, 

का कभी नहीं आचरण किया। 

भटका मिथ्यात्व मोह में जो, 

मिच्छा मि दुक्कडं लेता हूं।।

 

भव-भव में मुझ को बोधि मिले, 

संयम समता के फूल खिले। 

मुनि ‘शोभा’ आत्म-शांति पाने, 

मिच्छा मि दुक्कडं लेता हूं।।

 

यह गीत आत्मशुद्धि, विनम्रता और क्षमा की महान भावना का संदेश देता है। सच्चे पश्चाताप और आत्मजागरण के माध्यम से व्यक्ति शांति, समता और संयमपूर्ण जीवन की ओर अग्रसर हो सकता है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏