यह भक्ति-भरा भजन साध्वी जतनकुमारीजी द्वारा रचित है। इसमें प्रातःकाल उठकर प्रभु का स्मरण करने की प्रेरणा दी गई है। भजन में चौबीस तीर्थंकरों, गणधरों, सतियों तथा आचार्य परम्परा का गुणगान किया गया है। संदेश यह है कि प्रभु नाम का स्मरण जीवन के अज्ञान और दुःख को दूर कर आत्मा को शुद्ध, पावन और आनंदमय बनाता है।
भोर-भोर उठ कर प्रभू नै सुमरलै
🎶 लय – बादळियो
✍🏻 रचयिता – साध्वी जतनकुमारीजी
भोर-भोर उठ कर प्रभू
भोर-भोर उठ कर प्रभू नै सुमरलै,
भव-जल तूं तर ज्यावैला ओ मनवा।
प्रभू नाम च्यांनणिये स्यूं आंगणियै नै भरलै,
अंधियारो मिट ज्यावैला, ओ मनवा।।
ऋषभ, अजित, संभव, अभिनन्दन है,
सुमति, पद्म, सुपार्श्व जग वंदन है।
बंधन सब कट ज्यावैला, ओ मनवा।।
चन्द्रप्रभु, सुविधि, शीतल, श्रेयांस है,
वासुपुज्य, विमल, अनन्त गुण-राश है।
आनन्दमय दिन ज्यावैला, ओ मनवा।।
धर्म, शांति, कुन्थु, अर, मल्ली भगवान है,
मुनिसुव्रत, नमि, नेमि, पारस, वर्धमान है।
सुख सम्पति बढ़ ज्यावैला, ओ मनवा।।
इग्यारह है गणधर बीस विहरमाण है,
सोलह सतियां रो नाम करै कल्याण है।
पावन तूं बण ज्यावैला, ओ मनवा।।
भिक्षु, भारीमाल, राय, जय, मघराज है,
माणिक, डालिम, कालू, तुलसी शासन सिरताज है।
महाप्रज्ञ मन भावैला, ओ मनवा।
‘जतन’ काम बण ज्यावैला, ओ मनवा।।
यह भजन हमें सिखाता है कि दिन की शुरुआत प्रभु स्मरण से करनी चाहिए। जिनवाणी और गुरु परम्परा के प्रति श्रद्धा रखने से जीवन में सुख, शांति, सद्गुण और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
