हे वीतराग! भव पार करो (Hey Vitarag! Bhav Paar Karo)

यह भजन भगवान महावीर सहित चौबीस तीर्थंकरों, पंच परमेष्ठी, गणधरों, आचार्यों तथा महान सती नारियों के गुणों का स्मरण कराता है। रचयिता साध्वी राजीमतीजी ने सरल भावों में वीतराग प्रभु से भवसागर से पार लगाने और समता का भाव देने की प्रार्थना की है। यह भजन श्रद्धा, भक्ति, सदाचार और आत्मकल्याण की प्रेरणा देता है तथा जिनधर्म के आदर्शों से जीवन को जोड़ता है। 

 

हे वीतराग! भव पार करो

🎶 लय – महावीर मुझे ज्योतित करदो 

✍🏻 रचयिता – साध्वी राजीमतीजी

 

हे वीतराग! भव पार करो। 

कण-कण में समता भाव भरो।।

 

श्री ऋषभ, अजित, संभव स्वामी, 

है अभिनन्दन अन्तर्यामी। 

जिन सुमति, पद्म, सुपार्श्व स्मरो, 

हे वीतराग! भव पार करो।।

 

श्री चन्द्र, सुविधि, शीतल सुखकर, 

श्रेयांस, वासुजिन, विमल प्रवर। 

योगीश! अनन्त विकार हरो, 

हे वीतराग! भव पार करो।।

 

श्री धर्म, शांति, कुन्थु, अर है, 

मल्ली, मुनिसुव्रत जिनवर है। 

नमि, नेमिनाथ का ध्यान धरो, 

हे वीतराग! भव पार करो।।

 

श्री पार्श्वनाथ, महावीर प्रभो, 

अरिहन्त सिद्ध आचार्य विभो। 

श्री उपाध्याय, मुनि भार हरो, 

हे वीतराग! भव पार करो।।

 

गौतम आदि ग्यारह गणधर, 

श्री स्थूलिभद्र शासन शेखर। 

जिन-धर्म शुद्ध संस्कार भरो, 

हे वीतराग! भव पार करो।।

 

ब्राह्मी, सुलसा, चन्दनबाला, 

कौशल्या, जनकसुता, चूला। 

हे मृगावती कल्याण करो, 

हे वीतराग! भव पार करो।।

 

कुन्ती, दमयन्ती, प्रभावती, 

द्रुपदा, पद्मावती, शिवासती। 

सब राजीमती का नाम स्मरो, 

हे वीतराग! भव पार करो।।

 

है सती सुभद्रा, सुखकारी, 

श्री रिषभसुता सबको प्यारी। 

सोलह सतियां भव ताप हरो, 

हे वीतराग! भव पार करो।।

 

भिक्षु, भारी, रिषि, जीतगणी, 

मघ, माणिक, डालिम, कालूगणी। 

तुलसी, महाप्रज्ञ का जाप करो, 

हे वीतराग! भव पार करो।।

 

यह भजन वीतराग प्रभु, गुरुओं और सती आदर्शों के प्रति श्रद्धा जगाता है। इसके भाव मन को शुद्ध बनाकर समता, भक्ति और सद्गुणों की ओर प्रेरित करते हैं तथा आत्मकल्याण का मार्ग दिखाते हैं। 

🙏जय जिनेंद्र🙏