यह स्तवन भगवान पद्मप्रभु की महिमा और गुणों का सुंदर वर्णन करता है। इसमें प्रभु की निर्लेपता, संयम, शुक्ल ध्यान और केवलज्ञान की प्राप्ति का स्मरण किया गया है। रचना में बताया गया है कि प्रभु की वाणी शांति और उपशम से भरी हुई है। उनके स्मरण से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं, विघ्न दूर होते हैं और आत्मा को कल्याण का मार्ग प्राप्त होता है।
पदम प्रभू नित समरियै - निर्लेप पदम जिसा प्रभू
🎶 लय – कुशलपुरी में प्रभु जनमिया
✍🏻 रचयिता – श्रीमज्जयाचार्य
पदम प्रभू नित समरियै
निर्लेप पदम जिसा प्रभू,
प्रभु पदम पिछाण।
संयम लीधो तिण समै,
पाया चोथो नाण।।
ध्यान शुकल प्रभु ध्याय नैं,
पाया केवल सोय।
दीनदयाल तणी दशा,
कैणी नावै कोय।।
सम दम उपशम रस भरी,
प्रभु! आपरी वाण।
त्रिभुवन तिलक तूं ही सही,
तूं ही जनक समान।।
तूं प्रभु कल्पतरू जिसो,
तूं चिन्तामणि जोय।
समरण करतां आपरो,
मन-वांछित होय।।
सुखदायक सहु जग भणी,
तूं ही दीनदयाल।
शरण आयो तुझ साहिबा!
तूं ही परम कृपाल।।
गुण गातां मन गह-गहै,
सुख संपत्ति जाण।
विघन मिटै समरण कियां,
पामै परम कल्याण।।
उगणीसै नैं भाद्रवै,
सुदि बारस देख।
पदम प्रभू रट्या लाडनूं,
हुओ हरष विशेष।।
यह स्तवन भगवान पद्मप्रभु के गुणों का स्मरण कर श्रद्धा और भक्ति को दृढ़ बनाता है। प्रभु का चिंतन मन को शांति, सद्गुण और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
