अजितप्रभु स्तवन – अहो प्रभु! तुम ही दायक शिव-पन्थ नां (Ajit Prabhu Stavan – Aho Prabhu! Tum Hi Dayak Shiv Panth Na)

यह स्तवन श्रीमज्जयाचार्य द्वारा रचित भगवान अजितनाथ की भावपूर्ण वंदना है। इसमें प्रभु को सच्चा आश्रय, दुःखों का नाश करने वाला और मोक्षमार्ग का दाता बताया गया है। रचना में राग-द्वेष, मोह और विषय-भोगों से बचने की प्रेरणा दी गई है। साथ ही, प्रभु के उपदेशों, आगम-वचनों और ध्यान के महत्व को सरल भावों में व्यक्त किया गया है। 

 

अजितप्रभु स्तवन - अहो प्रभु! तुम ही दायक शिव-पन्थ नां

🎶 लय – अहो प्रिय तुम वाट पाड़ी

✍🏻 रचयिता – श्रीमज्जयाचार्य

 

अहो प्रभु! 

तुम ही दायक शिव-पन्थ नां

 

अहो प्रभु! 

अजित जिनेश्वर आपरो, 

ध्याऊं ध्यान हमेश हो। 

अहो प्रभु! 

अशरण शरण तूं ही सही, 

मेटण सकल कलेश हो।।

 

अहो प्रभु! 

उपशम रस भरि आपरी, 

वाणी सरस विशाल हो। 

अहो प्रभु! 

मुगति-निसरणी मनोहरू, 

सुण्यां मिटै भ्रम जाल हो।।

 

अहो प्रभु! 

उभय बंधण आप आखिया, 

राग-द्वेष विकराल हो। 

अहो प्रभु! 

हेतु ए नरक निगोद नां, 

राच्या मूरख बाल हो।।

 

अहो प्रभु! 

रमणी राखसणी कही, 

विषबेली मोहजाल हो। 

अहो प्रभु! 

काम-भोग किम्पाक-सा, 

दाख्या दीन-दयाल हो।।

 

अहो प्रभु! 

विविध उपदेश देई करी, 

तें तास्या नरनार हो। 

अहो प्रभु! 

भव सिन्धु-पोत तूं ही सही, 

तूं ही जगत्-आधार हो।।

 

अहो प्रभु! 

शरण आयो तुझ साहिबा! 

बस रह्या हीया मांय हो। 

अहो प्रभु! 

आगम-वयण अङ्गीकरी, 

रह्यो ध्यान तुझ ध्याय हो।।

 

अहो प्रभु! 

संवत उगणीसै भाद्रवै, 

दसमी आदितवार हो। 

अहो प्रभु! 

आप तणां गुण गाविया, 

वर्त्या जै जै कार हो।।

 

यह स्तवन हमें प्रभु की शरण में रहकर मोह, राग-द्वेष और भ्रम से दूर होने की प्रेरणा देता है। इसके भाव आत्मकल्याण, सदाचार और मोक्षमार्ग की ओर बढ़ने का सुंदर संदेश प्रदान करते हैं। 

🙏जय जिनेंद्र🙏