यह भजन तप, संयम और आत्मजागृति का सुंदर संदेश देता है। इसमें अठाई और मासखमण जैसे कठिन तपों की महिमा बताई गई है। रचयिता समझाती हैं कि तप से मन और तन दोनों शुद्ध होते हैं तथा जीवन का सच्चा सार प्राप्त होता है। सांसारिक मोह छोड़कर आत्मकल्याण की ओर बढ़ने और समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा इस रचना में सरल भाषा में दी गई है।
करल्यो-करल्यो अठायां अब मास खमण थे करल्यो हो
🎶 लय – तेजा रे
✍🏻 रचयिता – साध्वी राजीमतीजी
करल्यो-करल्यो अठायां,
अब मास खमण थे करल्यो हो।
तप ही जीवन रो साचो सार हो ।।
मन रो मेल उतर तन होज्या,
सागीड़ो नीरोग हो।
साचो गंगाजल तप है आपणै।।
हाड़-मांस मिट्टी री काया,
चमक देख क्यूं चकरावै।
कांई भरोसो बोलो सांस रो।।
बड़ी तपस्या कम खाणो,
गम खाणो ओ नम ज्याणो हो।
मन रे घोड़ै नै सीखो मोड़णो।।
जागो जागो नींद उड़ावो,
शासन माँ बतलावै है।
अवसर रा बाया मोती नीपजै।।
जैन-संघ में हुया तपस्वी,
एक-एक स्यूं मोटा हो।
‘धनजी खंदक’ नै करल्यो याद थे।।
यह भजन हमें तप, त्याग और जागरूकता का महत्व सिखाता है। जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए धर्म और आत्मसाधना में लगकर अवसर का लाभ उठाना ही सच्ची सफलता और कल्याण का मार्ग है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
