तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा (Tulsi Swami Re! Mangal Naam Tumhara)

यह भजन आचार्यश्री तुलसी के महान जीवन, तप, अनुशासन और मानवता के प्रति उनके अद्भुत योगदान का भावपूर्ण वर्णन करता है। इसमें उनके जन्म, दीक्षा, गुरु भक्ति, अणुव्रत आंदोलन और समाज सुधार के कार्यों को सरल शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। रचयिता ने श्रद्धा और भक्ति के साथ गुरुदेव के प्रेरणादायी व्यक्तित्व का गुणगान किया है।

 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा

🎶 लय – कुंथु जिनवर रे 

✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री महाप्रज्ञ 

 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा, 

अन्तर्यामी रे! मेरा सबल सहारा, 

तुलसी स्वामी रे!

 

जन्म तुम्हारा सिंह लग्न में, 

साक्षी पौरुष-गाथा, 

सिंह तुल्य विक्रम के सम्मुख, 

झुक जाता है माथा। 

झंझावातों में नहीं कभी जो हारा, 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा।।

 

शहर लाडनूं पावन भूमी, 

झूमर कुल बलशाली, 

विक्रम संवत् इकहत्तर में, 

जन्मा वह गणमाली। 

वदना-आंगण में उदित हुआ ध्रुवतारा, 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा।।

 

शैशव वय में प्रतिभा उभरी, 

जीवन-वन महकाया, 

गुरु कालू कर शीष धराकर, 

मुनिवर का पद पाया। 

भैक्षव-शासन का भावी भव्य सितारा, 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा।।

 

ग्यारह वर्षों तक गुरुवर के, 

इंगित को आराधा, 

शिक्षा-दीक्षा के कौशल से, 

परम लक्ष्य को साधा। 

सहज समर्पण से जीवन खूब निखारा, 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा।।

 

शिक्षक का दायित्व संभाला, 

सोलह वर्ष अवस्था, 

लघुवय में ही प्रिय अनुशासन, 

प्रिय थी सदा व्यवस्था। 

आत्मोदय का रे! होता कहां किनारा? 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा।।

 

इचरज है बाईस वर्ष में, 

तेरापथ अनुशास्ता, 

नवमासन ने प्रगति शिखर का, 

खोला सीधा रास्ता। 

हुई प्रवाहित रे! नव चिंतन की धारा, 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा ।।

 

धर्मक्रांति का शंखनाद कर, 

सोया विश्व जगाया, 

अणुव्रत की आचार संहिता, 

का गौरव गहराया। 

सघन तमिस्त्रा में अद्भुत आज उजारा, 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा।।

 

वर्ण-जाति या संप्रदाय के, 

रूढ़िवाद को तोड़ा, 

एक जाति मानव की, 

मानव से मानव को जोड़ा। 

मंजुल-मंजुल है! मानव धर्म नजारा, 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा।।

 

शिक्षा-पूर्वक दीक्षा हो, 

यह नई कल्पना आई, 

शिक्षण संस्था में जन-जन, 

ने देखी है गहराई। 

भिक्षु स्वामी का अंतिम शब्द निहारा, 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा।।

 

नये मोड़ से नवयुग आया, 

जाग उठी तब नारी, 

युगद्रष्टा के प्रति आभारी, 

रहती जनता सारी। 

युग परिवर्तन का कोई नया इशारा, 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा।।

 

नये तीर्थ का किया प्रवर्तन, 

समण श्रेणि कल्याणी, 

आगम संपादन से मुखरित, 

महावीर की वाणी। 

शाश्वत सत्यों को आस्था सहित उभारा, 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा।।

 

यात्रा की है अकथ कहानी, 

इक मुख कौन कहेगा, 

अनगिन है अवदान महाप्रभु, 

केवल-गम्य रहेगा। 

शासन-सुषमा में तुलसी सबका प्यारा, 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा।।

 

किया विसर्जन अपने पद का, 

शासन सुदृढ़ बनाया, 

छोड़ अचानक चले गए प्रभु, 

यह तो नहीं सुहाया।  

किया समाहित है ‘महाप्रज्ञ’ में सारा, 

तुलसी स्वामी रे! मंगल नाम तुम्हारा।।

 

अंत में यह भजन आचार्यश्री तुलसी के त्याग, तप और मानव कल्याण के कार्यों को नमन करता है। उनका जीवन आज भी समाज को सत्य, अनुशासन और सद्भाव का मार्ग दिखाता है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏