महाप्राण गुरुदेव – कैसी वह कोमल काया रे (Mahapraan Gurudev – Kaisi Veh Komal Kaya Re)

यह भजन आचार्यश्री महाप्रज्ञ के दिव्य व्यक्तित्व, वात्सल्य, अनुशासन और ज्ञानमयी जीवन का सुंदर वर्णन करता है। इसमें गुरुदेव की कोमलता, मधुर वाणी, महान तप और समाज के प्रति उनके योगदान को भावपूर्ण शब्दों में सजाया गया है। रचयिता ने श्रद्धा, प्रेम और भक्ति से गुरुदेव के गुणों का गान किया है। यह भजन मन में गुरु भक्ति और प्रेरणा जगाता है।

 

महाप्राण गुरुदेव - कैसी वह कोमल काया रे

🎶 लय – दीपांवाले नंद

✍🏻 रचयिता – आचार्यश्री महाप्रज्ञ

 

कैसी वह कोमल काया रे, 

महाप्राण गुरुदेव। 

पुष्पों ने शीश झुकाया रे, 

महाप्राण गुरुदेव। 

कंचन सी कोमल काया रे, महाप्राण गुरुदेव।।

 

कानों की छटा निराली, 

आंखें इमरत की प्याली। 

किसने सौंदर्य सझाया रे, 

महाप्राण गुरुदेव।।

 

माधुर्य कंठ में घोला, 

ममता को किसने तोला। 

वात्सल्य मूर्त बन पाया रे, 

महाप्राण गुरुदेव।।

 

तुमने जो ग्रन्थ गढ़ा है, 

वह सबके शीश चढ़ा है। 

शाश्वत का स्वर लहराया रे, 

महाप्राण गुरुदेव।।

 

शासन को खूब संवारा, 

अनुशासन गजब निहारा। 

शीतल-शीतल सी छाया रे, 

महाप्राण गुरुदेव।।

 

जीवन भर काम करूंगा, 

गण का भंडार भरूंगा।  

संकल्प अटूट निभाया रे,

महाप्राण गुरुदेव।। 

 

श्रम पल-पल अविकल चलता, 

अनुभव का सुरतरु फलता। 

पौरुष का मूल्य बढ़ाया रे, 

महाप्राण गुरुदेव।।

 

जग परिवर्तन का प्यासा, 

तुमसे थी उसको आशा। 

यह कैसा दृश्य दिखाया रे, 

महाप्राण गुरुदेव।।

 

‘तुलसी’ यह यह नाम पियारा, 

तुलसी का नाम सहारा। 

अद्भुत सौरभ महकाया रे, 

महाप्राण गुरुदेव।।

 

तुम भित्र देह से स्वामी, 

आत्मा के अन्तर्यामी। 

जागृति का पाठ पढ़ाया रे, 

महाप्राण गुरुदेव।।

 

तुम जीवन के निर्माता, 

प्रभु! मेरे भाग्य विधाता।  

है अलख अगोचर माया रे, 

महाप्राण गुरुदेव।।

 

गुरुवर की बढ़े प्रतिष्ठा, 

यह ‘महाप्रज्ञ’ की निष्ठा। 

जय विजय-ध्वज लहराया रे, 

महाप्राण गुरुदेव।।

 

अंत में यह भजन गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा, प्रेम और समर्पण का संदेश देता है। गुरुदेव का जीवन, ज्ञान और अनुशासन आज भी सभी को सही मार्ग दिखाता है।

🙏जय जिनेंद्र🙏