यह भजन आत्मजागृति, समता और आत्मशुद्धि का सुंदर संदेश देता है। इसमें साध्वी फूलकुमारीजी ने सरल शब्दों में बताया है कि सच्चा प्रभु बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर विराजमान है। भजन मन को राग-द्वेष छोड़कर मैत्री, ऋजुता और जागरूक जीवन अपनाने की प्रेरणा देता है। आत्मा की शाश्वतता और वीतरागता की भावना इस रचना का मुख्य आधार है।
प्रातः उठकर ध्यान धरूं मैं विमल भावना भाऊं हो
🎶 लय – तिरिया मिरिया
✍🏻 रचयिता – साध्वी फूलकुमारीजी (सुजानगढ़)
प्रातः उठकर ध्यान धरूं मैं,
विमल भावना भाऊं हो,
चेतन चिन्मय दिवलो जोकर,
अन्तर ज्योति पाऊं हो।
मन मंदिर में प्रभु विराजै,
खोज-खोज मैं हारी हो,
एक बार भीतर देखूं तो,
पाऊं प्रभुता सारी हो।।
हर क्षण विणसै है आ काया,
शाश्वत है आत्मा म्हारी।
जागरूक जीवन जीणै स्यूं,
मिट ज्यावै दुविधा सारी।।
ऋजुता रो मैं दर्पण लेकर,
अपणो रूप निहारूं हो।
समता रे झूले में झुलूं,
कटुता भाव विसारूं हो।।
राग-द्वेष री ग्रंथि तोडूं,
मैत्री भाव विकसाऊं हो।
गुणि जन रा गुण गा गाकर,
पावन मैं बण ज्याऊं हो।।
सुख-दुःख सारा है देहि में,
क्यूं इण स्यूं घबराऊं हो।
पाप भीरूता पग-पग राखूं,
शुद्ध बुद्ध बण ज्याऊं हो।।
वो दिन ‘फूल’ धन्य हुवैला,
वीतरागता पाऊं हो।
आनंद घन रो रस पी पीकर,
अजर अमर पद पाऊं हो।।
यह भजन आत्मा की पवित्रता, समता और वीतरागता का मार्ग दिखाता है। इसके भाव मन को शांत कर आत्मकल्याण और सच्चे आनंद की प्रेरणा देते हैं।
🙏जय जिनेंद्र🙏
