निज भूल सुधारो जी (Nij Bhool Sudharo Ji)

यह रचना आचार्यश्री तुलसी द्वारा लिखी गई है, जिसमें मनुष्य को अपनी गलतियों को पहचानने और सुधारने की प्रेरणा दी गई है। इसमें बताया गया है कि दूसरों की कमी देखने के बजाय पहले स्वयं को सुधारना जरूरी है। कवि सरल भाषा में समझाते हैं कि जब हर व्यक्ति अपनी भूल सुधारेगा, तब पूरा समाज अपने आप सुधर जाएगा। 

 

निज भूल सुधारो जी

🎶 लय – म्हांनै चाकर राखोजी 

✍🏻 रचयिता – आचार्यश्री तुलसी 

 

निज भूल सुधारो जी, 

भूल सुधारो मूल सुधारो, 

ऊंडी बात विचारो। 

अपणी-अपणी भूल सुधास्यां, 

सुधर जाए जग सारो।।

 

नुक्ताचीणी औरां री तो, 

करण नयन मुंह फारो। 

डूंगर बळती जग देखै पर, 

पगतळ क्यूं न निहारो?

 

अपनी भूल भयंकर तो भी, 

ज्यूं-त्यूं ढांकण ढाळो। 

कमी पराई राई जित्ती, 

प्हाड़ करै परबारो।।

 

पीत रोग रो रोगी देखै, 

पीत रंग सगळां रो। 

दोषी री भी आ ही हालत, 

दियै तळै अन्धारो।।

 

अपणो दोष सुधारयां ही, 

नर हौवे सबनै प्यारो। 

उदाहरण यदि सुणणो चावो, 

तो है ‘सेठ सुता’ रो।।

 

पहलो ओ कर्तव्य भव्यजन! 

अपणो घर संभारो। 

‘तुलसी’ हेतुभूत सन्त जन, 

निज स्यूं निज निस्तारो।।

 

यह रचना सिखाती है कि अपने दोष सुधारना ही सच्ची प्रगति है। दूसरों की आलोचना छोड़कर स्वयं को सुधारने से ही जीवन और समाज दोनों बेहतर बनते हैं। यही सही और सरल जीवन का मार्ग है। 

🙏जय जिनेंद्र🙏