यह भजन आचार्य तुलसी द्वारा रचित है। इसमें मानव जीवन की महत्ता को सरल शब्दों में समझाया गया है। कवि बताते हैं कि मनुष्य जन्म बहुत दुर्लभ है, जैसे चिंतामणि रत्न। जीव ने अनगिनत जन्मों में दुख सहकर यह अवसर पाया है। इसलिए इसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। भजन हमें जागने, सही मार्ग अपनाने और अपने जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा देता है।
दुर्लभ चिन्तामणि सम पायो प्राणी! ओ मानव-अवतार
🎶 लय – म्हांरा सतगुरु करत विहार
✍🏻 रचयिता – आचार्यश्री तुलसी
दुर्लभ चिन्तामणि सम पायो,
प्राणी! ओ मानव-अवतार।
ओ मानव-अवतार,
चेतन क्यूं खोवै बेकार?
चौरासी रै चक्कर में तूं,
रुळ्यो अनन्ती बार।
नरक-कुण्ड में सही सजोरी,
जमदूता री मार।।
ढ़ोर हुयो जब परवशता में,
ढ़ोयो भारी भार।
जंगल में जद बण्यो जिनावर,
थारी हुई शिकार।।
माटी जल जलचर थलचारी,
बिच्छू सांप सियार।
घोर वेदना सही सबल स्यूं,
दुर्बल स्यूं फुंकार।।
किती बार तूं मरयो गर्भ में,
जननी नै संहार।
काट-काट कर बारै काढ्यो,
हा! दुख हृदय विदार।।
जनम-जनम री संचित करणी,
आज हुयी साकार।
मानव-चोळो रतन-कचोळो,
कोड्यां में मत हार।।
तज जंजाल हाल ही कर तूं,
परम तत्त्व स्यूं प्यार।
जाग-जाग दै झालो सतगुरु,
‘तुलसी’ तारणहार।।
यह भजन हमें सिखाता है कि मानव जीवन अनमोल है। इसे मोह-माया में खोकर नष्ट न करें। सतगुरु के मार्ग पर चलकर आत्मकल्याण करें और जीवन को सफल बनाएं।
🙏जय जिनेंद्र🙏
