यह भजन जीवन की सच्चाई को सरल भाषा में समझाता है। इसमें बताया गया है कि मनुष्य अकेला आता है और अकेला ही जाता है, इसलिए उसे अपने कर्म और विवेक पर ध्यान देना चाहिए। दूसरों के साथ मोह और तुलना छोड़कर आत्मज्ञान जगाना जरूरी है। अपने कर्मों का फल खुद ही भोगना पड़ता है।
तूं आयो है एकलो रे भाई! जासी एकाएक
🎶 लय – आभै चमकै बिजली
✍🏻 रचयिता – आचार्यश्री तुलसी
तूं आयो है एकलो रे भाई! जासी एकाएक,
कोई न सागै चालसी, तू करलै जरा विवेक।
देख हालत औरां री रे, करै क्यूं थारी म्हारी रे?
क, अन्तर ज्ञान जगालै,
जगत में साथी नहीं है कोई थांरो ।।
सगळा भुगतै आपरी भाई!
करणी आपो आप,
गहराई स्यूं सोचलै तूं,
कुण बेटो? कुण बाप?
खाड़ खिणसी सो पड़सी रे,
जहर खासी सो मरसी रे,
क, अन्तर ज्ञान जगालै,
जगत में साथी नहीं है कोई थांरो।।
रहणो अपणै आप में भाई!
ज्यूं जंगल रो कैर,
नां कोई स्यूं मित्रता है,
नां कोई स्यूं बैर।
मस्त है अपणी धुन में रे,
मोज एकाकीपण में रे,
क, अन्तर ज्ञान जगालै,
जगत में साथी नहीं है कोई थांरो।।
सपनै में भी सुख नहिं,
कोई पावै पर-आधीन,
आठ पहर आनन्द में है,
सदा सुखी स्वाधीन।
रहै निज गुण में रमतो रे,
आपरो आपो दमतो रे,
क, अन्तर ज्ञान जगालै,
जगत में साथी नहीं है कोई थांरो।।
मूल सकल संघर्ष रो है,
द्वैत-भाव अवलोय,
‘नमि ज्यूं एकाकी भलो’,
कोई दोय मिल्यां दुख होय।
एकता सदा सुहावै रे,
भावना ‘तुलसी’ भावै रे,
क, अन्तर ज्ञान जगालै,
जगत में साथी नहीं है कोई थांरो।।
यह भजन हमें जागरूक करता है कि जीवन में आत्मज्ञान और एकांत का महत्व समझें। अपने कर्म सुधारें और दूसरों पर निर्भर न रहें। सच्चा सुख अपने भीतर ही मिलता है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
