तीर्थंकर महावीर प्रभु! – स्तुति – इस जगत में तुम्हारे जैसा (Tirthankar Mahavir Prabhu! – Stuti – Is Jagat Mein Tumhare Jaisa)

यह सुंदर स्तुति भगवान महावीर के अद्भुत धैर्य, तप, समभाव और करुणा का वर्णन करती है। इसमें बताया गया है कि उन्होंने बड़े से बड़े कष्टों को भी बिना विचलित हुए सहन किया और आत्मबल से केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके उपदेश हमें संयम, वैराग्य, क्षमा और मोक्ष के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। यह स्तुति श्रद्धा और भक्ति से उनका स्मरण कराती है। 

 

तीर्थंकर महावीर प्रभु! - स्तुति - इस जगत् में तुम्हारे जैसा

महावीर प्रभु! 

इस जगत् में तुम्हारे जैसा कोई वीर नहीं। 

तुम उपसर्ग सहते कभी विचलित नहीं होते। 

मेरु की भांति अडोल रहते हो।

 

प्रभो! तुम इस युग के चौबीसवें तीर्थंकर हो, 

अन्तिम तीर्थंकर हो। 

तुम दोषों का नाश करने के लिए महान वीर हो। 

तुमने विकट तप और प्रवर ध्यान कर, 

भव-जल का पार पा लिया।

 

संगम देव ने भयंकर कष्ट दिये फिर भी दयासिन्धो! 

तुम्हारी दृष्टि सुप्रसन्न थी। 

तुमने यही सोचा कि अद्भुत है यह बात, 

मुझसे जगत का उद्धार हो रहा है, 

और यह मुझे निमित्त बना डूब रहा है।

 

आदिवासी लोगों ने तुम्हें नाना प्रकार के कष्ट दिये। 

तुम ध्यान सुधा के रस में लीन थे। 

इसलिए तुम्हारी प्रसन्नता कभी टूट नहीं पायी।

 

इस प्रकार कर्मक्षय कर तुमने केवलज्ञान प्राप्त किया, 

और उपशम रस से भरी हुई अनुपम वाणी का उद्घोष किया।

 

पौद्गलिक सुख मोक्ष के बाधक हैं और नरक देने वाले हैं। 

किम्पाक लता के समान वासना को छोड़कर संवेग पूर्वक संयम को धारण किया।

 

निन्दा-स्तुति और मान-अपमान में समभाव तथा हर्ष, 

शोक और मोह के परिहार द्वारा निर्वाण-पद प्राप्त होता है।

 

इस उपदेश के द्वारा तुमने अनेक लोगों को संसार-समुद्र से तार दिया। 

हे अंतिम तीर्थंकर! 

मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। 

तुम्हारी स्तुति से मुझे बहुत आनंद मिला।

यह स्तुति भगवान महावीर के आदर्श जीवन और दिव्य उपदेशों का स्मरण कराती है। उनके बताए संयम, समभाव और अहिंसा के मार्ग पर चलकर प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को श्रेष्ठ और कल्याणकारी बना सकता है।

🙏जय जिनेंद्र🙏