यह सुप्रसिद्ध भजन मुनि श्री कन्हैयालाल जी ‘कमल’ द्वारा रचित है, जो तप (तपस्या) की महिमा और शक्ति का सुंदर बखान करता है। राजस्थानी पुट वाली इस रचना में बताया गया है कि तपस्या केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि जीवन का असली श्रृंगार है। कवि के अनुसार, तप से आत्मा के पुराने पाप धुल जाते हैं और व्यक्ति में अदम्य साहस का संचार होता है। यह गीत हमें आत्म-शुद्धि और संकल्प शक्ति की प्रेरणा देता है।
तपस्या जीवन रो श्रृंगार
✍🏻 रचयिता – मुनि श्री कन्हैयालाल जी ‘कमल’
तपस्या जीवन रो श्रृंगार सारी दुनिया कवै,
तप में भारी चमत्कार सारी दुनिया कवै।
हिम्मत री है कीमत भारी,
हिम्मत री है महिमा न्यारी,
तपस्या हिम्मत रो आधार सारी दुनिया कवै।
वीर पुरुष ही तपस्या करसी,
जन्म जन्म रा पातक झरसी,
सारो हिम्मत रो व्यापार सारी दुनिया कवै।
तप करने स्यूं गुण चमकैला,
तप र आगे देव झुकैला,
तप में शक्ति है अणपार सारी दुनिया कवै।
तप दीपक री ज्योति निराली,
अन्तरतम को हरने वाली,
तपस्या इच्छित फल दातार सारी दुनिया कवै।
तप गंगा में सगल्या न्हाओ,
मुनि ‘कन्हैया’ मोद मनाओ,
होसी शासाण गुलजार सारी दुनिया कवै।
यह प्रेरक रचना हमें सिखाती है कि तपस्या ही जीवन को निखारने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। मुनि श्री ‘कमल’ के ये शब्द आत्म-कल्याण और संयम की प्रेरणा देते हैं, जिससे न केवल अंतर्मन प्रकाशित होता है, बल्कि संपूर्ण जीवन सार्थक बनता है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
