तपसण! थांरे जीवन री उजली भोर है  (Tapasan! Thaare Jivan Ri Ujli Bhor Hai)

यह सुंदर कविता तपस्या की महिमा को समर्पित है। इसमें एक तपस्वी (तपसण) के कठिन संकल्प और उनकी आध्यात्मिक शक्ति का गुणगान किया गया है। कवि कहते हैं कि जहाँ दुनिया मोह-माया में उलझी रहती है, वहीं तपस्वी ने अपनी इच्छाओं को त्याग कर ‘मासखमण’ (एक महीने का उपवास) जैसा महान तप किया है। यह रचना न केवल उनके धैर्य की प्रशंसा करती है, बल्कि परिवार और समाज में छाई खुशी को भी दर्शाती है। यह उनके अभिनंदन का एक भावपूर्ण प्रयास है।

 

तपसण! थांरे जीवन री उजली भोर है

🎶 लय – मोरिया! आछो बोल्यो रे 

 

तपसण! थांरे जीवन री, उजली भोर है, 

थांने देख्यां म्हारा, 

मनड़ा हर्ष विभोर, तपसण।  

 

तपसण! तप री म्है, महिमा गावां गर्व स्यूँ,  

थांरो अभिनंदन म्है, 

आज करां पुरजोर, तपसण। 

 

तपसण! ममता माया में, उलझ्या मानषी,

धे तप धारयो तन री, 

मन री ममता तोड़, तपसण। 

 

तपसण! ‘मास खमण’ तप मोटो थे करयो,

कोरी बातां करतां, 

आवै कांई जोर, तपसण। 

 

तपसण! थारे कुल में, रंग रलियाँ छा गई, 

हर्षित पुलकित नाचे, 

सारां रा मन मोर, तपसण।  

 

यह गीत हमें सिखाता है कि संयम और तप से ही जीवन में सच्ची चमक आती है। तपस्वी का यह कठिन मार्ग पूरे परिवार के लिए गौरव का प्रतीक है। उनकी यह साधना हम सभी के लिए प्रेरणादायक है। 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏