यह भजन तप की महिमा और उसके आध्यात्मिक प्रभाव का सुंदर वर्णन करता है। साध्वी राजीमतीजी ने बताया है कि तप से कर्मों की निर्जरा होती है, मन के विकार दूर होते हैं और आत्मा निर्मल बनती है। भजन में अनेक महान तपस्वियों के उदाहरण देकर तप की प्रेरणा दी गई है। यह रचना हमें क्रोध, अहंकार और आसक्ति छोड़कर सच्चे तप के मार्ग पर चलने का संदेश देती है।
तप घुंघरु छम छमाछम बाजै रै
🎶 लय – घुंघरु छम छमाछम
✍🏻 रचयिता – साध्वी राजीमतीजी
घुंघरु छम छमाछम,
छण णण छणणण बाजै रै, बाजै रै।
तपसी रै आंगणियै,
शासण देव विराजै रै।।
तप स्यूं होवे निर्जरा,
तप स्यूं कर्म खपाय।
तप स्यूं बचगी द्वारिका,
कह्यो सूत्र रे मांय।।
घोर तपस्वी धन्नो मुनिवर,
काढ्यो तन रो सार।
शालिभद्र भी करी तपस्या,
मासखमण अवधार।।
कोदर, भीम, रामसुख तपसी,
करयो करारो काम।
झूम-झूम गुण-गाथा गावो,
कटज्या कष्ट तमाम।।
घोर तपस्वी नाम कमायो,
‘सुख मुनि’ तप सिणगार।
नीर बिना भोजन कस्यो,
कई दिनों तक धार।।
तुलसी शासण में हुई,
‘भूरां सती’ सजोर।
बारह मासी तप तप्यो,
गुरु चरणां में घोर।।
तप रो ताप तपावै तन ने,
तपज्या मनो विकार।
साचो तपसी करै सदाही,
क्रोध मान परिहार।।
घर में जद गंगा बहै,
करल्यो आंगण साफ।
मैली चादर धोयल्यो,
मिटज्या मन रा ताप।।
इस भजन का सार है कि तप आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण का श्रेष्ठ साधन है। जो व्यक्ति तप, संयम और सद्गुणों को अपनाता है, उसका जीवन पवित्र बनता है और वह आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है।
🙏जय जिनेंद्र🙏
