स्वामीजी थारै शासन में मौज उड़ावा हां (Swamiji Thare Shasan Mein Mauj Udava Haan)

यह भजन साध्वी रतनश्री जी द्वारा रचित है, जिसमें आचार्य भिक्षु स्वामीजी के प्रति गहरी श्रद्धा और भक्ति व्यक्त की गई है। इसमें उनके शासन में मिलने वाली खुशी, शांति और सौभाग्य का सुंदर वर्णन है। भजन में बताया गया है कि स्वामीजी का मिलना जीवन का सबसे बड़ा भाग्य है। उनके त्याग, मर्यादा और साहस से जीवन में प्रेरणा मिलती है और भक्ति का भाव जागृत होता है। 

 

स्वामीजी थारै शासन में मौज उड़ावा हां

🎶 लय – थांरै शासण में म्है  

✍🏻 रचयिता – साध्वी रतनश्री जी (लाडनूं) 

 

स्वामीजी थारै शासन में, 

मौज उड़ावा हां।

खुशियां खूब मनावां हां, 

म्हारा भाग सरावां हां।।

 

बड़े भाग्य स्यूं कलियुग में, 

म्है स्वामीजी नै पाया, 

मानो मीरां रै मंदिर में, 

प्रकट सांवरा आया। 

भक्ति रै फुलड़ां री मिलजुल, 

भेंट चढ़ावां हां।।

 

बिन्दु बणकर आया हा थे, 

सिन्धु बणकर गूंज्या, 

जीवन रे समरांगण में थे, 

रणजोधा ज्यूं जूझ्या। 

थांरै कष्टां री क्हाणी सुण, 

कांप ज्यावां हां।।

 

मर्यादा पुरुषोत्तम भिक्षु, 

मर्यादावां बांधी, 

श्रमण संघ री विश्रृंखल सब, 

कड़ियां नै थे सांधी। 

सिंह पुरुष थांरी हिम्मत पर, 

वारी जावां हां।।

 

स्वामीजी थारै दर्शन री, 

प्यासी अंखियां म्हांरी, 

‘रत्न’ भिक्षु रै नाम मात्र स्यूं, 

टरै आपदा सारी। 

भिक्षु-भिक्षु-भिक्षु-भिक्षु, 

रटन लगावां हां।।

 

यह भजन हमें स्वामीजी के आदर्शों को अपनाने और उनके बताए मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। उनके नाम का स्मरण करने से जीवन में सुख, शांति और आत्मिक शक्ति प्राप्त होती है। 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏