स्वामीजी थांरै संघ री महिमा महकावै है (Swamiji Thare Sangh Ri Mahima Mehkave Hai)

यह भक्ति-गीत साध्वी राजीमती जी द्वारा रचित है। इसमें आचार्य श्री भिक्षु द्वारा स्थापित पवित्र संघ की महिमा का सुंदर वर्णन किया गया है। गीत में संघ के अनुशासन, मर्यादित जीवन और त्याग-तपस्या की प्रेरणा को भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। साथ ही संघ के महान आचार्यों और गणिवरों के योगदान को भी श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया है।

 

स्वामीजी थांरै संघ री महिमा महकावै है

🎶 लय – माताजी थांरै आंगणै

✍🏻 रचयिता – साध्वी राजीमती जी 

 

स्वामीजी थांरै संघ री, 

महिमा महकावै है। 

सारा मोद मनावै है, 

मन दरियो लहरावै है।।

 

फल्यो फूल्यो ओ गण उपवन है, 

जोशीला वनमाली, 

संत सती कोयल ज्यूं कुंजै, 

बैठ रूंख री डाळी। 

ईं बगिया री सौरभ स्यूं, 

सगळा सुख पावै है।।

 

गण इतिहास पढ़ण नै, 

सूरज चाँद उतरकर आसी, 

तुलसी रै पावन चरणां में, 

सादर शीष झुकासी। 

बलिदानां री अमर कहाणी, 

जन-जन गावै है।।

 

मर्यादित जीवन जीणो ओ, 

गण म्हांनै सिखलावै, 

अनुशासन ही प्राण संघ रो, 

संविधान बतलावै। 

श्री भिक्षु री त्याग तपस्या, 

रंग खिलावै है।।

 

भारीमाल, रिषिराय, जीत, मघ, 

माणिक, डालिम गणिवर, 

सदा बढ़ायो गौरव गण रो, 

सगळा शासन शेखर, 

कालूगणी री महिमा तो, 

मुलकां महकावै है। 

तुलसी महाप्रज्ञ री मूरत, 

नयणां छावै है ।।

 

यह भक्ति-गीत संघ की महान परंपरा, अनुशासन और त्याग की महिमा को याद दिलाता है। इसे गाते समय मन में श्रद्धा और प्रेरणा का भाव जागता है तथा संघ के प्रति सम्मान और भक्ति और भी गहरी हो जाती है। 

🙏 जय जिनेंद्र 🙏