यह भजन जैन तेरापंथ के प्रथम आचार्य श्री भिक्षु स्वामीजी के चरणों में गहरी श्रद्धा और भक्ति का सुंदर भाव प्रकट करता है। इसमें कवि मुनि बुद्धमल्ल जी ने स्वामीजी के साहस, दूरदर्शिता और मर्यादा स्थापना के महान कार्यों का भावपूर्ण वर्णन किया है। भजन के माध्यम से बताया गया है कि स्वामीजी ने संघ को एकता की डोर में बांधकर संयम और सम्यक्त्व का उज्ज्वल मार्ग दिखाया।
स्वामीजी! थारै चरणां री, बलिहारी जावां हां
🎶 लय – माताजी थारै आंगणै
✍🏻 रचयिता – मुनि बुद्धमल्ल जी
स्वामीजी! थांरै चरणां री,
बलिहारी जावां हां।
म्हें लुळ-लुळ शीष झुकावां हां,
म्हें तन-मन भेंटचढ़ावां हां।।
साहस रा थे हा पुतळा,
हद नीवां गहरी बांधी,
डिगै न गण रो महल मनोहर,
बिरखा हो चाहे आंधी।
थांरी सूझ-बूझ रो कोई,
पार न पावां हां ।।
सामी छाती कष्ट सह्या थे,
कदै न पग दियो पाछो,
जीत पागड़ै रही सदा ही,
नाम मंत्र सो साचो।
हीरे जिसो खरो जीवन हो,
तेज सरावां हां ।।
बिखस्यां नै थे दी मरजादा,
एक डोर में बांध्या,
टूट्या दिल रा तार सहज ही,
प्रेम-भाव स्यूं सांध्या।
संजम रो शुभ पंथ दिखायो,
आनंद पावां हां।।
समकित-चारित रा पग-पग पर,
उजळा दीप जळाया,
मिट्यो अंधेरो घट-घट रो,
जद आगै कदम बढ़ाया।
जन-मन रा थे बण्या देवता,
गौरव गावां हां ।।
गौहाटी में लग्यो रंग,
भैक्षव-शासण रो भारी,
महामोच्छव री चहल-पहल,
ज्यूं फूली है फुलवारी।
‘बुद्ध’ आज स्वामीजी रा म्है,
ढ़ोल घुरावां हां ।।
यह भजन आचार्य भिक्षु स्वामीजी के महान जीवन, उनके आदर्शों और उनके द्वारा स्थापित मर्यादा का स्मरण कराता है। इसे गाकर भक्त उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं और उनके दिखाए संयम मार्ग पर चलने की प्रेरणा पाते हैं।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
