यह भजन भिक्षु स्वामीजी की दिव्य समाधि, त्याग, तप और आत्मिक प्रभाव का भावपूर्ण वर्णन करता है। इसकी पंक्तियों में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक जागरण की अनुभूति होती है। सरल भाषा और लोकधुन में रचा गया यह भजन श्रोता के मन को सहज ही शांति और भक्ति से भर देता है। इसमें स्वामीजी के जीवन, समाधि-क्षण और उनके तेजस्वी प्रताप का स्मरण करते हुए श्रद्धालुओं को सत्पथ पर चलने की प्रेरणा मिलती है।
स्वामीजी! झणण झणण झणझण
🎶 लय – घुंगरू छम छमा छम
स्वामीजी! झणण झणण झणझण,
झणाट सी रूं-रूं लागै रे।
सिरियारी री समाधि पर
कोई सगती जागै रे।।
सूई पाग में टांगतो बोल्यो,
दरजी हुशियार।
अब तो देरी बाबोजी री,
म्हारो काम सो त्यार।।
पद्मासन पर विराज लीन्हो,
काउसग्ग मुद्रा ध्यान।
आपां रै अब क्यांरी देरी,
कहतां छोड्या प्राण।।
साठे भादव सुद तेरस नै,
मंगल चौथे पेर।
धम्मगिरि पर चिता रचाई,
रंग-गुलाल बिखेर।।
मिली एक सौ पिचपन वर्षां,
पछै समाधि सचेत।
संपतजी गधियै नै बाबो,
दियो ज्योति संकेत।।
देह भसम स्यूं उठै तरंगा,
‘सागर’ अपणै आप।
रंग-रली पाली चौमासे,
बाबे रे परताप।।
यह भजन भिक्षु स्वामीजी के त्याग और तप की स्मृति को जीवंत करता है। इसके भाव मन को शुद्ध कर भक्ति की ओर ले जाते हैं। श्रद्धा से इसका पाठ करने पर अंतःकरण में शांति और आध्यात्मिक चेतना का अनुभव होता है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
