यह भक्ति-गीत आचार्य श्री महाप्रज्ञ द्वारा रचित है। इसमें गुरु के प्रति गहरा प्रेम, श्रद्धा और आत्मीय भाव व्यक्त किए गए हैं। कवि स्वामीजी के मधुर व्यक्तित्व, उनके दिव्य चिंतन और नैतिक संदेश को स्मरण करता है। गीत में गुरु से पुनः मार्गदर्शन और प्रेरणा देने की विनम्र प्रार्थना है। इसमें अणुव्रत, मानवता और आध्यात्मिक चेतना का सुंदर वर्णन मिलता है।
स्वामी! कौन-सा सुरीला तुमने गीत गाया?
🎶 लय – स्वामी भीखणजी रो नाम
✍🏻 रचयिता – आचार्य श्री महाप्रज्ञ
स्वामी! कौन-सा सुरीला तुमने गीत गाया?
स्वामी! कौन-सा अनबोला मंत्र याद आया?
अद्भुत जीवन अद्भुत गाथा,
स्वामी! कौन-सा सुरलोक तुमको याद आया?
आकर्षक व्यक्तित्व तुम्हारा,
याद हमें है अब भी सारा,
तुम भूल गए, यह कैसी माया?
लाखों आंखें है उपवासी,
कान बने हैं ये संन्यासी,
अब प्यास बुझाओ, अवसर आया।।
जनम-जनम के हम हैं साथी,
चिर परिचित है जीवन बाती,
महावीर ने गौतम को बतलाया।।
तुम हम, हम तुम, सोचा हमने,
चिर परिचय को तोड़ा तुमने,
सुर तरु को दो फिर शीतल छाया।।
अणुव्रत में आलोक निहारा,
मानवता का रूप निखारा,
नैतिक चेतना का अंकुर उग आया।।
अमृत महोत्सव यहां मनाएं,
अचरज प्रभु को पास न पाएं,
दिव्य प्रेम का उच्छ्वास कैसे गहराया?
साथ बैठते चिन्तन चलता,
चिन्तन से नवनीत निकलता,
मन उपवन रहता सरसाया।।
अनगिन हैं अवदान तुम्हारे,
जन-जन के तुम प्राण पियारे,
उपकार न कोई गिन पाया।।
‘महाप्रज्ञ’ की हर गतिविधि में,
तुलसी हो, तुलसी सन्निधि में,
तेरापंथ यशस्वी बन पाया।।
यह गीत गुरु-भक्ति और आत्मीय संबंध का सुंदर उदाहरण है। इसमें श्रद्धा, प्रेम और कृतज्ञता की गहरी भावना झलकती है। स्वामीजी के आदर्श आज भी जीवन को दिशा और प्रकाश प्रदान करते हैं।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
