यह भक्ति-गीत भगवान सीमंधर स्वामी के प्रति गहरी श्रद्धा और विनय प्रकट करता है। इसमें भक्त प्रभु के चरणों में शीश नवाकर उनके दर्शन की प्रार्थना करता है और संसार के दुखों से मुक्ति माँगता है। इस भजन में भगवान के दिव्य गुण, अतिशय और करुणा का सुंदर वर्णन है। साथ ही, सम्यक दर्शन, ज्ञान और तप के मार्ग पर चलकर जन्म-मरण के चक्र से पार होने की प्रेरणा दी गई है।
सीमंधर भगवान
सीमंधर भगवान
जी मैं चरणां शीश नमाऊं,
जी मैं दर्शन किण विध पाऊं।
जी म्हारी वीनतड़ी अवधारो,
जी मोहे तारो पार उतारो।।
जी संसार लगै छै खारो,
जी वैराग्य लगै छै प्यारो।
जी म्हारा आवागमन निवारो,
जी सीमंधर भगवान।।
सीमंधर प्रभुजी नै प्रणमुं,
चरणां शीष नमाय।
आप तणां गुण मुख स्यूं गायां म्हारा,
भव-भव रा दु:ख जाय।।
स्वाम म्हांरा भव-भव रा दु:ख जाय,
जी मैं चरणां…
चौतीस अतिशय अति शोभता,
वाणी गुण पैंतीस।
एक सहंस अठ लखण विराजै,
जीत्या राग न रीष।।
काया ऊंची धनुष पांच सौ,
सूतर में विस्तार।
स्फटिक सिंहासन आप विराज्या,
थाप्या तीरथ च्यार।।
झिगमिग ज्योत झीगामिग दीपै,
कंचन वरणी काय।
चौसठ इन्द्र करै थांरी सेवा,
सुर नर लागै पाय।।
हीवड़े में तो हूंस घणी छै,
दर्शन करूं तिहां आय।
आडा पर्वत बहती नदियां,
आयो किणविध जाय।।
देव मित्र इसड़ो नाहि म्हारै,
विमान में बैसाय।
शक्ति नहीं मैं किणविध आऊं,
लब्धि न फोड़ी जाय।।
इह भव में तो आय नहिं सकुं,
करूं जुं कोड़ उपाय।
सूतर मांही वचन आपरा,
चालूं निर्मल न्याय।।
शील रथे ऊपर बेसी नै,
धर्म ध्वजा फहराय।
समकित ज्योति करी अगवाणी,
करण जोग चित्त ल्याय।।
ज्ञान कटारी कस कर बांधूं,
तप रूपी तलवार।
राग द्वेष दोय पतला पाडूं,
करदयूं खेवो पार।।
सूत्र वचन परमाण करी नै,
च्यार कषाय निवार।
अरिहंत, सिद्ध तणा गुण गाऊं,
इम उतरूं भव पार।।
स्वाम म्हारा इम उतरूं भव पार,
जी मैं चरणा शीश…
यह भजन भगवान सीमंधर स्वामी की सच्ची भक्ति, श्रद्धा और समर्पण की भावना सिखाता है। यह हमें उनके गुणों का स्मरण करने और सम्यक मार्ग पर चलकर आत्मा की शुद्धि तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है।
🙏 जय जिनेंद्र 🙏
